क्या आपको अभिनव कश्यप के सलमान खान और उनके भाइयों पर लगाए आरोपों पर यकीन है?

बिल्कुल यकीन है! 100 फ़ीसदी यकीन है!! सिर्फ इसमें दुख और अफसोस इस बात का है कि सलमान खान के विरुद्ध अभिनव कश्यप या किसी और सेलिब्रेटी का ज़रा देर से जागना!

अभिनव कश्यप और कंगना जैसे लोगों को नींद से जगाने के लिए सुशांत सिंह राजपूत जैसे एक निहायत ही योग्य कलाकार को अपने जान की कुर्बानी देनी पड़ी!

यूट्यूब पर जब बिग बॉस फेम पूजा मिश्रा चीख चीख कर सलीम के तीनों सपूतों पर बलात्कार करने का आरोप लगाती थी तब यह फिल्म इंडस्ट्री कहां थी!!! आधे हिंदुस्तान की तरह फिल्म उद्योग के बुद्धिजीवी लोग उसे पागल घोषित कर बैठे।

पूजा ने अपने वीडियो में कई बार इस बात का जिक्र किया है कि दबंग फिल्म के लिए हीरोइन के तौर पर पहली पसंद वही थी और उस फिल्म में रोल देने का झांसा देकर सलमान अरबाज और सोहेल तीनों ने उसका यौन शोषण किया था।

राखी सावंत जैसी सी ग्रेड की हस्ती भी उस समय खान बंधुओं का अधिवक्ता बन बैठी और अपनी एक वीडियो में सलमान को निर्दोष साबित करते हुए उसने कहा कि पूजा से खूबसूरत तो सलमान की नौकरानी हैं।

सबको पूजा की चिल्लाहट में उसका पागलपन दिखा लेकिन किसी को उसमे एक यौन पीड़ित लड़की का रोष नहीं दिखा!

और अगर वो पागल ही थी तो उसने खान बंधुओ को छोड़ कर बाकी किसी सेलिब्रेटी पर ऐसे आरोप क्यों नहीं लगाए?

पूजा मिश्रा के समर्थन में उस समय अभिनव कश्यप क्यों नहीं आगे आए, जब अरिजीत को सलमान के खेमे से बैन किया गया तब कौन सा सुल्फा पी कर अभिनव सो रहे थे! अफसोस इसी बात का है कि उनको नींद से जगाने के लिए एक बंदे को पंखे से लटकना पड़ा!

विवेक ओबरॉय, अरिजीत सिंह, पूजा मिश्रा यह तो सिर्फ महज उजागर हुए नाम है जिनका करियर सलमान खान ने बर्बाद किया है ना जाने कितने सैकड़ों गुमनाम आर्टिस्ट या टेक्नीशियन है जिनके करियर को सलमान खान का घमंड रौंद चुका है।

निलाप कौल फिल्म उद्योग से जुड़े एक सिनेमैटोग्राफर है। सोहेल खान की फिल्म आई प्राउड टू बी एन इंडियन और किसान जैसी फ़िल्मे उन्होंने ही शूट की है…. उन्हें दबंग फिल्म के लिए लिया जाना तय किया गया था लेकिन शायद अनजाने में उनसे भी सलमान का कोई ईगो हर्ट हो गया और उन्हें भी आज तक हिंदी फिल्मों में ढंग का काम नहीं मिलता। आज कल वे रीजनल फिल्मों में सक्रिय हैं।

सपना चौधरी की डेब्यू फिल्म “दोस्ती के साइड इफैक्ट” से हिंदी फिल्मों में अपना करियर शुरू करने वाले अभिनेता विक्रांत आनंद का करियर भी भाईजान ने ही चौपट किया है।

फाइट क्लब फिल्म में जो किरदार अश्मित पटेल ने निभाया है उससे पहले विक्रांत करने वाले थे। किसी अज्ञात कारणों से फिल्म की शूटिंग के कुछ दिनों पहले उन्हें फिल्म से निकाल दिया गया और उनकी जगह अश्मित पटेल को ले लिया गया।

अगले कई सालों तक बॉलीवुड में असफल ऑडिशन देने के बाद विक्रांत ने भोजपुरी में तीन फिल्मे करने के बाद दोस्ती के साइड इफेक्ट से बॉलीवुड में अपना करियर शुरू किया।

विवेक का प्रेस कांफ्रेंस आपको याद होगा उन्होंने कहा था कि जब सलमान ने उन्हें गालियां देनी शुरू की तो उन्होंने सोहेल से बात की…सोहेल ने विवेक से कहा कि आपको जो कदम उठाना है आप उठा सकते हो! बेचारे विवेक ने अप्रत्यक्ष धमकी को समझे बिना प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला ली। उसको मैं पढ़ा लिखा होशियार जानता था लेकिन वो तो मां लक्ष्मी का वाहन निकला!

मुझे सलमान खान शुरू से पसंद नहीं हैं….देख लो तो पचास ग्राम खून जल जाता है….उनको देख कर एक नेगेटिव एनर्जी मिलती है….आज से नहीं हैलो ब्रदर वाले जमाने से! तब फिल्मों में पुंगी बजाते थे आज कल छेद कर के कंफ्यूज करते हैं। अभिनय के नाम पर सरदर्द और मनोरंजन के नाम पर कब्ज ही दिया है उन्होंने फिर भी आधा हिंदुस्तान उनका दीवाना है और मेरे जैसे उनके आलोचक पूजा जैसे पागल कहे जाते हैं…

डिस्क्लेमर: उपरोक्त लेख लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। पाठकों का सहमत होना आवश्यक नहीं है। उत्तर में वर्णित निलाप कौल और विक्रांत आनंद से लेखक की व्यक्तिगत जान पहचान है और उन पर आधारित वाक्या लेखक ने दोनों से बातचीत के आधार पर लिखा है।

https://bit.ly/2UQ5Ua3

ऐसा क्यों प्रतीत होता है कि भारतीय को अशिक्षित रख छोड़ने के लिए ब्राह्मण जिम्मेदार है ?

👉#थोड़ा समय दीजिए, विषय पढ़ने लायक है..

👉जिस #छुआछूत को #बदनाम कर करके #उपन्यासो में, #फिल्मों में #ब्राह्मणो को झूठा और फर्जी बदनाम किया गया वहीं छुआछूत आज #ब्रह्मांड की #ब्रह्मास्त्र बनकर #रक्षा कर रहा है।।

👉आपने अपने शास्त्रों का खूब मज़ाक उड़ाया था जब वह यह कहते थे कि जिस व्यक्ति का आप चरित्र न जानते हों, उससे जल या भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए ।

👉क्योंकि आप नहीं जानते कि अमुक व्यक्ति किस विचार का है , क्या शुद्धता रखता है ,कौन से गुण प्रधान का है , कौन सा कर्म करके वह धन ला रहा है , शौच या शुचिता का कितना ज्ञान है , किस विधा से भोजन बना रहा है , उसके लिए शुचिता या शुद्धता के क्या मापदंड हैं इत्यादि !!!

👉किन्तु वर्तमान समय में एक #करोना_वायरस की वजह से सभी को एक मीटर तक की दूरी बनाए रखने की हिदायत पूरा विश्व दे रहा है और जो व्यक्ति दूरी नहीं बनाता है उसे सजा देने का काम कर रहे हैं पूरा विश्व लकड़ाउन का पालन करने को मजबूर है

👉जिसका चरित्र नहीं पता हो , उसका स्पर्श करने को भी मना किया गया है

👉यह बताया जाता था कि हर जगह पानी और भोजन नहीं करना चाहिए , तब English में american और british accent में आपने इसको मूर्खता और discrimination बोला था !!

👉बड़ी #हँसी आती थी तब !!!! #बकवास कहकर आपने अपने ही #शास्त्रों को दुत्कारा था ।

और आज ??????

👉यही जब लोग विवाह के समय वर वधु की 3 से 4 पीढ़ियों का अवलोकन करते थे कि वह किस विचारधारा के थे ,कोई जेनेटिक बीमारी तो नहीं , किस height के थे , कितनी उम्र तक जीवित रहे , खानदान में कोई #वर्ण #संकर का इतिहास तो नहीं रहा इत्यादि ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि आने वाली सन्तति विचारों और शरीर से स्वस्थ्य बनी रहे और बीमारियों से बची रहे , जिसे आज के शब्दों में GENETIC SELECTION बोला जाता है ।

👉जैसे आप अपने पशु चाहे वह कुत्ता हो या गाय हो का गर्भाधान कराते हैं तो यह ध्यान रखते हैं कि अमुक कुत्ता या बैल हृष्ट पुष्ट हो , बीमारी विहीन हो , अच्छे “नस्ल” का हो । इसीलिए वीर्य bank बना जहाँ अच्छे sperms की उपलब्धता होती है ।

ऐसा तो नहीं कहते न कि इसको जिससे प्रेम हो उससे गर्भाधान करा लें । तब तो समझ रहे हैं न कि आपकी कुतिया या गाय का क्या हश्र होगा और आने वाली generation क्या होगी !!!!!

👉पर आप इन सब बातों पर हंसते थे ।।।

👉यही शास्त्र जब बोलते थे कि जल ही शरीर को शुद्ध करता है और कोई तत्व नहीं ,बड़ी हँसी आयी थी आपको !!

👉तब आपने बकवास बोलकर अपना पिछवाड़ा tissue paper से साफ करने लगे ,खाना खाने के बाद जल से हाथ धोने की बजाय tissue पेपर से पोंछ कर इतिश्री कर लेते थे ।

और अब ????

👉जब यही शास्त्र बोलते थे कि भोजन ब्रह्म के समान है और यही आपके शरीर के समस्त अवयव बनाएंगे और विचारों की शुद्धता और परिमार्ज़िता इसी से संभव है इसलिए भोजन को चप्पल या जूते पहनकर न छुवें ।

👉बड़ी हँसी आयी थी आपको !! #Obsolete कहकर आपने खूब मज़ाक उड़ाया !!!

👉जूते पहनकर खाने का प्रचलन आपने दूसरे देशों के आसुरी समाज से ग्रहण कर लिया । Buffet system बना दिया ।

👉उन लोगों का मजाक बनाया जो जूते चप्पल निकालकर भोजन करते थे ।

👉अरे हमारी कोई भी पूजा , यज्ञ, हवन सब पूरी तरह स्वच्छ होकर , हाथ धोकर करने का प्रावधान है ।

👉पंडित जी आपको हाथ में जल देकर हस्त प्रक्षालन के लिए बोलते हैं ।आपके ऊपर जल छिड़ककर मंत्र बोलते हैं :-

👉ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा ।।

यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्यभ्यन्तरः शुचिः ॥

👉ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।।

तब भी आपने मजाक उड़ाया ।

👉जब सनातन धर्मी के यहाँ किसी के घर शिशु का जन्म होता था तो सूतक लगता था । इस अवस्था में ब्राह्मण 10 दिन , क्षत्रिय 15 दिन , वैश्य 20 दिन और शूद्र 30 दिन तक सबसे अलग रहता है । उसके घर लोग नहीं आते थे , जल तक का सेवन नहीं किया जाता था जब तक उसके घर हवन या यज्ञ से शुद्धिकरण न हो जाये । प्रसूति गृह से माँ और बच्चे को निकलने की मनाही होती थी । माँ कोई भी कार्य नहीं कर सकती थी और न ही भोजनालय में प्रवेश करती थी ।

इसका भी आपने बड़ा मजाक उड़ाया ।।

👉ये नहीं समझा कि यह बीमारियों से बचने या संक्रमण से बचाव के लिए Quarantine किया जाता था या isolate किया जाता था ।

👉प्रसूति गृह में माँ और बच्चे के पास निरंतर बोरसी सुलगाई रहती थी जिसमें नीम की पत्ती, कपूर, गुग्गल इत्यादि निरंतर धुँवा दिया जाता था।

👉उनको इसलिए नहीं निकलने दिया जाता था क्योंकि उनकी immunity इस दौरान कमज़ोर रहती थी और बाहरी वातावरण से संक्रमण का खतरा रहता था ।

👉लेकिन आपने फिर पुरानी चीज़ें कहकर इसका मज़ाक उड़ाया और आज देखिये 80% महिलाएँ एक delivery के बाद रोगों का भंडार बन जाती हैं कमर दर्द से लेकर , खून की कमी से लेकर अनगिनत समस्याएं ।

👉ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शुद्र के लिए अलग Quarantine या isolation की अवधी इसलिए क्योंकि हर वर्ण का खान पान अलग रहता था , कर्म अलग रहते थे जिससे सभी वर्णों के शरीर की immunity system अलग होता था जो उपरोक्त अवधि में balanced होता था ।

👉ऐसे ही जब कोई मर जाता था तब भी 13 दिन तक उस घर में कोई प्रवेश नहीं करता था । यही Isolation period था । क्योंकि मृत्यु या तो किसी बीमारी से होती है या वृद्धावस्था के कारण जिसमें शरीर तमाम रोगों का घर होता है । यह रोग हर जगह न फैले इसलिए 14 दिन का quarantine period बनाया गया ।

👉अरे जो शव को अग्नि देता था या दाग देता था । उसको घर वाले तक नहीं छू सकते थे 13 दिन तक । उसका खाना पीना , भोजन , बिस्तर , कपड़े सब अलग कर दिए जाते थे । तेरहवें दिन शुद्धिकरण के पश्चात , सिर के बाल हटवाकर ही पूरा परिवार शुद्ध होता था ।

👉तब भी आप बहुत हँसे थे । bloody indians कहकर मजाक बनाया था !!!

👉जब किसी रजस्वला स्त्री को 4 दिन isolation में रखा जाता है ताकि वह भी बीमारियों से बची रहें और आप भी बचे रहें तब भी आपने पानी पी पी कर गालियाँ दी । और नारीवादियों को कौन कहे , वो तो दिमागी तौर से अलग होती हैं , उन्होंने जो ज़हर बोया कि उसकी कीमत आज सभी स्त्रियाँ तमाम तरह की बीमारियों से ग्रसित होकर चुका रही हैं ।

👉जब किसी के शव यात्रा से लोग आते हैं घर में प्रवेश नहीं मिलता है और बाहर ही हाथ पैर धोकर स्नान करके , कपड़े वहीं निकालकर घर में आया जाता है , इसका भी खूब मजाक उड़ाया आपने ।

👉आज भी गांवों में एक परंपरा है कि बाहर से कोई भी आता है तो उसके पैर धुलवायें जाते हैं । जब कोई भी बहूं , लड़की या कोई भी दूर से आता है तो वह तब तक प्रवेश नहीं पाता जब तक घर की बड़ी बूढ़ी लोटे में जल लेकर , हल्दी डालकर उस पर छिड़काव करके वही जल बहाती नहीं हों , तब तक । खूब मजाक बनाया था न ?

👉इन्हीं ब्राह्मणों को अपमानित किया था जब ये माँस और चमड़ों का कार्य करने वाले लोगों को तब तक नहीं छूते थे जब तक वह स्नान से शुद्ध न हो जाये । ये वही लोग थे जो जानवर पालते थे जैसे सुअर, भेड़ , बकरी , मुर्गा , कुत्ता इत्यादि जो अनगिनत बीमारियाँ अपने साथ लाते थे ।

ये लोग जल्दी उनके हाथ का छुआ जल या भोजन नहीं ग्रहण करते थे तब बड़ा हो हल्ला आपने मचाया और इन लोगों को इतनी गालियाँ दी कि इन्हें अपने आप से घृणा होने लगी ।

👉यही वह कार्य करने वाले लोग थे जो प्लेग , TB , चिकन पॉक्स , छोटी माता , बड़ी माता , जैसी जानलेवा बीमारियों के संवाहक थे ,और जब आपको बोला गया कि बीमारियों से बचने के लिए आप इनसे दूर रहें तो आपने गालियों का मटका इनके सिर पर फोड़ दिया और इनको इतना अपमानित किया कि इन्होंने बोलना छोड़ दिया और समझाना छोड़ दिया ।

👉आज जब आपको किसी को छूने से मना किया जा रहा है तो आप इसे ही विज्ञान बोलकर अपना रहे हैं । Quarantine किया जा रहा है तो आप खुश होकर इसको अपना रहे हैं ।

👉जब शास्त्रों ने बोला था तो ब्राह्मणवाद बोलकर आपने गरियाया था और अपमानित किया था ।

👉आज यह उसी का परिणति है कि आज पूरा विश्व इससे जूझ रहा है।

👉याद करिये पहले जब आप बाहर निकलते थे तो आप की माँ आपको जेब में कपूर या हल्दी की गाँठ इत्यादि देती थी रखने को ।

यह सब कीटाणु रोधी होते हैं।

शरीर पर कपूर पानी का लेप करते थे ताकि सुगन्धित भी रहें और रोगाणुओं से भी बचे रहें ।

लेकिन सब आपने भुला दिया ।।

👉आपको तो अपने #शास्त्रों को गाली देने में और #ब्राह्मणों को #अपमानित करने में , उनको भगाने में जो आनंद आता है शायद वह परमानंद आपको कहीं नहीं मिलता ।

👉अरे मूर्खों !! अपने #शास्त्रों के level के जिस दिन तुम हो जाओगे न तो यह देश विश्व गुरु कहलायेगा ।

👉तुम ऐसे अपने #शास्त्रों पर ऊँगली उठाते हो जैसे कोई मूर्ख व्यक्ति का 7 वर्ष का बेटा ISRO के कार्यों पर प्रश्नचिन्ह लगाए ।

👉अब भी कहता हूँ अपने #शास्त्रों का #सम्मान करना सीखो । उनको मानो। बुद्धि में शास्त्रों की अगर कोई बात नहीं घुस रही है तो समझ जाओ आपकी बुद्धि का स्तर उतना नहीं हुआ है । उस व्यक्ति के पास जाओ जो तुम्हे शास्त्रों की बातों को सही ढंग से समझा सके ।

👉आपको बता दूँ कि आज जो जो #Precautions बरते जा रहे हैं , #मनुस्मृति उठाइये , उसमें सभी कुछ एक एक करके वर्णित है ।

👉लेकिन #आप पढ़ते कहाँ हैं , दूसरे #गधों की बातों में आकर #प्रश्नचिन्ह उठायेंगे और उन्हें जलाएंगे।

👉जिसने विज्ञान का गहन अध्ययन किया होगा , वह शास्त्र वेद पुराण इत्यादि की बातों को बड़े ही आराम से समझ सकता है , corelate कर सकता है और समझा भी सकता है ।

👉लेकिन मेरी यह बात स्वर्ण अक्षरों में लिख लीजिये कि #मनुस्मृति से सर्वश्रेष्ठ विश्व में कोई संविधान नहीं बना है और एक दिन पूरा विश्व इसी #मनुस्मृति संविधान को लागू कर इसका पालन करेगा ।

👉अनुरोध करता हूँ कि सभी कर्म से #ब्राह्मण बनिये ( भले आप किसी भी #जाति से हों ) और #ब्राह्मणत्व का पालन कीजिये इससे #इहलोक और #परलोक दोनों सुधरेगा…

#सर्वे भवन्तु सुखिनः #सवेँसनतु निरामया:

तियानमेन चौक नरसंहार घटना क्या थी?

[1]

1989 में लोकतंत्र बहाली को लेकर जन आंदोलन हुआ था, जिसके पीछे ज़्यादातर छात्र ही थे. इस आंदोलन ने इतनी व्यापकता हासिल की थी कि 3 , 4 जून 1989 को चीन की राजधानी बीजिंग में स्थित तियानमेन चौक पर सरकार के विरोध में एक लाख से ज़्यादा प्रदर्शनकारी इकट्ठे हो गए थे. इस विद्रोह को कुचलने के लिए चीन सरकार ने मार्शल लॉ लगाया था और

चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने तोपों, बंदूकों व टैंकों से गोलीबारी कर प्रदर्शनकारियों को मौत के घाट उतार दिया था.

प्रदर्शन का निर्दयतापूर्ण दमन करते हुए नरसंहार किया. चीनी सेना ने बंदूकों और टैंकरों के ज़रिये शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे नि:शस्त्र नागरिकों का दमन किया.

बताया जाता है कि इस चौक पर छात्र सात सप्ताह से डेरा जमाए बैठे थे. इस प्रदर्शन का जिस तरह से हिंसक दमन किया गया ऐसा चीन के इतिहास में कभी नहीं हुआ था. आज तक इस हिंसक दमन की वजह से चीन की दुनियाभर में आलोचना की जाती है.

सरकारी आंकड़े सिर्फ 300 मौतों के जारी हुए थे, लेकिन कभी अस्ल संख्या नहीं बताई गई. कई स्रोतों से दमनचक्र में मारे गए लोगों की संख्या के अनुमान सामने आए, जिनके मुताबिक डेढ़ हज़ार से ढाई हज़ार लोगों के मारे जाने तक की बात कही गई थी. एक दावे में तो 10 हज़ार लोगों के मारे जाने तक की बात कही गई थी.

इतने बड़े विद्रोह के कारण क्या थे?

सुधारवादी छवि के कम्युनिस्ट नेता हू याओबांग की मौत अप्रैल 1989 में होने के बाद उत्तर माओवादी चीन के लोगों में चीन के भविष्य को लेकर गहरी चिंताएं थीं. उस समय की चीनी सरकार की नीतियां भी लोगों को सोचने पर मजबूर कर रही थीं. देश में हर तरफ महंगाई, भ्रष्टाचार, नई अर्थव्यवस्था के लिए ग्रैजुएट्स के रोज़गार को लेकर सीमित सोच, प्रेस की स्वतंत्रता का हनन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन जैसे कई मुद्दों पर लोग नाराज़ थे.

सबसे बड़ी चिंता यह थी कि एक राजनीतिक पार्टी सिस्टम को कानूनी किया जा रहा था यानी सत्ता तानाशाही की तरफ बढ़ रही थी.

इन तमाम मुद्दों को लेकर सरकार का विरोध शुरू हुआ और इन प्रदर्शनों को इतना जन समर्थन मिला कि 3 और 4 जून 1989 को तियानमेन स्क्वायर पर एक लाख से ज़्यादा प्रदर्शनकारी इकट्ठे हो गए थे.

घटना से संबंधित कुछ तिथियां

4 जून 1989 : 3 और 4 जून की दरम्यानी रात एक बजे से चीनी सेना ने तियानमेन स्क्वायर पर गोलीबारी शुरू की और दिन भरे चले इस दमनचक्र में नागरिकों और छात्रों को मौत के घाट उतारा गया. मौतों का औपचारिक व वास्तविक आंकड़ा तक जारी नहीं किया गया.

5 जून 1989 : मशहूर टैंकमैन वाकया हुआ. एक प्रदर्शनकारी टैंकों को रोकता हुआ अकेला सड़क पर टैंकों के सामने खड़ा दिखा और इस तस्वीर को सालों तक चीन ने प्रतिबंधित रखा. इसी दिन, हांगकांग में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने के आयोजन में 70 हज़ार लोग जुटे.

फुटनोट

[1] थियानमेन चौक नरसंहार – Google Search

दुख्तरे हिन्दोस्तान….. नीलामे दो दीनार…..

“दुख्तरे हिन्दोस्तान….. नीलामे दो दीनार….. “

समयकाल.. ईसा के बाद की ग्यारहवीं सदी.. !

भारत अपनी पश्चिमोत्तर सीमा पर अभी-अभी ही राजा जयपाल की पराजय का साक्षी हुआ था .. !
इस पराजय के तुरंत पश्चात का अफगानिस्तान के एक शहर….. गजनी का एक बाज़ार..!
ऊंचे से एक चबूतरे पर खड़ी मिली-जुली उम्र की सैंकड़ों स्त्रियों की भीड़..
जिनके सामने सैंकड़ों.. या शायद हज़ारों वहशी से दीखते बदसूरत किस्म के लोगों की भीड़ लगी हुई थी.. अधिकतर अधेड़ या उम्र के उससे अगले दौर में थे.. !
कम उम्र की उन स्त्रियों की स्थिति देखने से ही अत्यंत दयनीय प्रतीत हो रही थी.. उनमें अधिकाँश के गालों पर आंसुओं की सूखी लकीरें खिंची हुई थी.. मानो आंसुओं को स्याही बना कर हाल ही में उनके द्वारा झेले गए भीषण दौर की कथा प्रारब्ध ने उनके गौरांग कोमल गालों पर लिखने का प्रयास किया हो.. ! एक बात जो उन सबमें समान थी…

एक भी अबला सन्नारी की देह पर वस्त्र का एक छोटा सा टुकड़ा नाम को भी नहीं था…. सभी सम्पूर्ण निर्वसना ….. !

सभी के पैरों में छाले थे.. मानो सैंकड़ों मील की दूरी पैदल तय की हो.. !

सामने खड़े वहशियों की भीड़ अपनी वासनामयी आँखों से उनके अंगों की नाप-जोख कर रही थी.. ! कुछ मनबढ़ आंखों के स्थान पर हाथों का प्रयोग भी कर रहे थे.. !

सूनी आँखों से अजनबी शहर और लुच्चों सरीखे अनजान लोगों की भीड़ को, कातर हिरणी की सी दयनीय दृष्टि से निहारती.. मात्र चंद दिन पहले तक एक से बढ़कर एक धनी,उच्च-कुलीन और प्रतिष्ठित परिवारों में किसी की बहन-बिटिया-अर्धांगिनी-माता-मौसी-चाची जैसी सम्मान-मूर्ती रहीं.. उन स्त्रियों के समक्ष हाथ में चाबुक लिए क्रूर चेहरे वाला घिनौने व्यक्तित्व घुटे सर का एक गंजा व्यक्ति खड़ा था.. मूंछ सफाचट.. बेतरतीब दाढ़ी उस पर तुर्की टोपी उसकी प्रकृतिजन्य कुटिलता को चार चाँद लगा रही थी.. !

दो दीनार….. दो दीनार… दो दीनार…

हिन्दुओं की खूबसूरत औरतें.. शाही लडकियां.. कीमत सिर्फ दो दीनार..

ले जाओ.. ले जाओ.. बांदी बनाओ…जिस मर्जी काम में लाओ.. एक लौंडी… सिर्फ दो दीनार..
दुख्तरे हिन्दोस्तां.. दो दीनार.. !
भारत की बेटी.. मोल सिर्फ दो दीनार.. !


किसी अखबार से जुड़े एक सज्जन अफगानिस्तान के गजनी नामक स्थान गये थे.. ! वहाँ उन्होंने उस जगह को देखा जहाँ हिन्दु औरतों की नीलामी हुई थी ! उस स्थान पर ‘बेगैरतों’ ने एक मीनार बना रखी है.. जिस पर लिखा है-

‘दुख्तरे हिन्दोस्तान.. नीलामे दो दीनार..’ अर्थात ये वो स्थान है… जहां हिन्दु औरतें दो-दो दीनार में नीलाम हुईं !
महमूद गजनवी हिन्दुओं के मुंह पर अफगानी जूता मारने.. उनको अपमानित करने के लिये अपने सत्रह हमलों में लगभग चार लाख हिन्दु स्त्रियों को पकड़ कर गजनी उठा ले गया.. घोड़ों के पीछे.. रस्सी से बांध कर..! महमूद गजनवी जब इन औरतों को गजनी ले जा रहा था.. तो वे अपने पिता.. भाई और पतियों से बुला-बुला कर बिलख-बिलख कर रो रही थीं.. अपनी रक्षा के लिए पुकार कर रही थी..! लेकिन करोडो हिन्दुओं के बीच से.. उनकी आँखों के सामने.. वो निरीह स्त्रियाँ मुठ्ठी भर जेहादी सैनिकों द्वारा घसीट कर भेड़ बकरियों की तरह ले जाई गई ! रोती बिलखती इन लाखों हिन्दु नारियों को बचाने न उनके पिता बढे.. न पति उठे.. न भाई और न ही इस विशाल भारत के करोड़ो समान्य हिन्दु !
उनकी रक्षा के लिये न तो कोई अवतार हुआ और न ही कोई देवी देवता आये ! महमूद गजनवी ने इन हिन्दु लड़कियों और औरतों को ले जा कर गजनवी के बाजारों में किसी सामान की तरह बेच ड़ाला ! विश्व के किसी धर्म का ऐसा अपमान नही हुआ जैसा हिन्दुओं का ! और ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि इन्होंने तलवार की मूठ को सोने से मढना छोड़ दिया.. ! सोचते हैं कि जब अत्याचार बढ़ेगा तब भगवान स्वयं उन्हें बचाने आयेंगे.. !
क्यों… ????????????
हिन्दुओं को समझ लेना चाहिये कि भगवान भी अव्यवहारिक अहिंसा व अतिसहिष्णुता को नपुसंकता करार देते हैं !
ये तो अब भी नहीं बदले हैं.. आज का ईराक जगह है.. और यजीदी गवाह.. !
तुम्हारी तैयारी क्या है ?

https://bit.ly/3e0BsS9

This really shocked me as an Indian.

I created a blog using WordPress and posted few articles.

Today, I checked the stats and couldn’t believe what I saw.

A part of India was missing on the map (representation of India). I couldn’t understand the reason behind this.

WordPress is indirectly trying to tell that POK doesn’t belong to India and portrays India without it.

This was really shocking to me and never expected such a thing ever.

I crosschecked using Google images and came across another map of India.

It doesn’t show POK and COK as part of India. This is how wikipedia demographics represents the map of India.

The real map of India consists of entire Jammu and Kashmir.

This really shocked me as an Indian.

https://bit.ly/2YroF4F

मोरारी बापू के नाम पत्र

मोरारी बापू के अली मौला और इस्लाम की मार्केटिंग करने से क्षुब्ध उनके एक पूर्व भक्त का “खुला खत”

माननीय

श्री_मोरारी_बापू जी,

हमारे शास्त्रों में अपराध के लिए, चाहे वो अनजाने में ही क्यों न हुआ हो, प्रायश्चित का विधान है. आपसे ही राम कथा में सुना था कि एक बार माँ पार्वती जी भगवान राम की मानवीय लीला से भ्रमित हो जाती हैं और उनकी परीक्षा लेने चली जाती हैं. वो परीक्षा के लिए माता सीता का रूप धारण कर लेती हैं. भगवान राम पहचान लेते हैं कि ये माता पार्वती हैं. यहाँ माँ पार्वती ने अनजाने में एक बार सीता जी का रूप बस धारण किया था और महादेव ने उनका परित्याग कर दिया, कि जिस शरीर से उमा माँ सीता का रूप धारण कर चुकी हैं उस शरीर को अपनी वामांगी नहीं बना सकता. माँ पार्वती को इस शरीर को अग्नि में भष्म कर अगले जन्म में कठोर तपस्या कर शिव को प्राप्त करना पड़ा.

यही प्रायश्चित का शास्त्र नियम आप पर भी लागू होता है कि जीवनपर्यंत रामकथा करके यश, कीर्ति, पहचान बनाने के बाद अंतकाल में आपके भीतर से बिना प्रयास अली मौला, या अल्लाह निकलने लगा है. दुनिया में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं है जो जिन्दगीभर अली मौला जपा हो और अंत में अनायास उसके भीतर से राम-राम निकलने लगा हो. पचास साल रामकथा करने के बाद, रामकथा के बीच में “राम-राम” की जगह आपके भीतर से जो “अली मौला” अवतरित हो जाता है. इसने राम की महिमा को कलंकित किया है. आपके जिस शरीर ने यह अपराध किया है उसे अब रामकथा करने का कोई अधिकार नहीं है.

भगवान राम के राज्याभिषेक में हनुमान, सुग्रीव, अंगद, जामवंत आदि सभी वानर यूथपति सम्मिलित हुए थें और उसके बाद प्रभु चरणों से दूर नहीं जाकर अयोध्या में ही बस जाना चाहते थें. भगवान ने कुछ समय तक उनकी बात मानी, फिर हनुमान जी को छोड़कर बाकी सभी को उनके घर भेज दिया. उसका कारण यह था कि जब सभी अपने-अपने घरों में निवास करते थें तो वहाँ अपने परिवार के बीच रहते हुए भी मन से राम का चिंतन करते रहते थें, पर अब यहाँ अयोध्या में शरीर से तो राम के निकट हैं पर मन से अपने परिवार के विषय में चिंतन कर रहे हैं. भगवान ने उन्हें घर इसलिए भेज दिया कि वे वहीं रहकर ईश्वर का चिंतन करें, इसी में उनका कल्याण है. ऐसे ही आप रामकथा में व्यासपीठ पर बैठकर “अली मौला” में डूबकर राम नाम की महिमा की अवहेलना किये हैं, उसका प्रायश्चित्त यही है कि आप एकांत में जाकर राम का चिंतन करें.

आप रामकथा के व्यासपीठ पर बैठकर “अल्लाह हू” और “नमामि शमीशान” को एक कर देने के लिए शास्त्र संशोधन तक करने पर आतुर हैं. आप रामकथा के लिए आये लोगों को अल्लाह हू जपा रहे हैं. चलिए इसी मोहब्बत के पैगाम को आगे बढ़ाते हुए मुस्लिम धर्मगुरुओं के मंच से राम जपवा देतें, पर आप तो वहाँ भी “बिस्मिल्लाह रहमान ए रहीम” की अलख जगाने लगें. मतलब आप रामकथा के मंच पर भी अल्लाह हू गायेंगे और मुस्लिम धर्मगुरुओं के मंच से भी बिस्मिल्लाह गायेंगे, तो क्या ये शास्त्र संशोधन कर एकतरफा मोहब्बत हिन्दुओं को ही निभाना है. आपकी इन हरकतों से सनातन की जड़ें कमजोर हो रही हैं, अगर आपको ये नहीं दीख रहा है तो आप में दूरदर्शिता का अभाव है और ऐसे अदूरदर्शी कथावाचक को हिन्दू समाज और अधिक झेलने के लिए तैयार नहीं है.

पचास साल से आप राम को बेचकर अपना गुजारा कर रहे हैं. सनातन धर्म ने आपको मान-सम्मान, पहचान सबकुछ दिया. अब आप अपना रिपोर्ट कार्ड सनातनियों को दिखाइये कि आपने “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” की दिशा में अबतक कितनो को सनातन धर्म में घर वापसी करवायी है. आप घर वापसी क्या करवायेंगे, आप तो खुद उनके आगे घुटने टेक दियें. पहले से सेक्युलर हिन्दू को आप और सेक्युलर बनाकर उसे और उसकी आनेवाली पीढ़ी को लव जिहाद की ओर धकेल रहे हैं. आपके ये सारे अपराध अक्षम्य हैं.

आपको तुलसीदास के रामचरितमानस, विनयपत्रिका, दोहावली, कवितावली आदि ने आज इस मुकाम पर पहुँचाया है. तुलसीदास ने जो रामचरितमानस और विनयपत्रिका आदि अपने आराध्य राम की महिमा में लिखा है. उन्होंने राम के लिए “करुणानिधान” शब्द का प्रयोग किया है और आप उनके पदों का उपयोग कर मोहम्मद पैगम्बर को करुणानिधान साबित करने लगें. आपने दुनियाभर की पुस्तकें पढ़ी हैं. निस्संदेह आपने कुरान और हदीस भी पढ़ी होगी. इन पुस्तकों को पढ़ने के बाद आपको अच्छे से पता चल गया होगा कि एक अल्लाह के अलावा कोई और ईश्वर नहीं है. आपके राम को ज्यादा से ज्यादा वो एक नबी का दर्जा दे सकते हैं, लेकिन कोटि ब्रहमाण्ड नायक ईश्वर कभी नहीं मान सकतें. यह जानते हुए आपने तुलसी के राम को अल्लाह के साथ घालमेल किया. यह आपने तुलसीदास के साथ भी द्रोह किया है.

तुलसीदास ने अपने इष्ट के प्रति अव्यभिचारिणी भक्ति का प्रतिपादन किया है. वे कहते हैं -” एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास। एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास।।” अर्थात तुलसीदास जी को सिर्फ एक राम का ही भरोसा है, उनको एक राम के ही बल का आश्रय है और उनकी सारी आशायें राम से ही हैं. तुलसी की भक्ति चातक की तरह एकनिष्ठ है जो सिर्फ स्वाति नक्षत्र के बारिश के पानी को ही अपने भीतर प्रवेश होने देती है, अगर वो प्यास से तड़प रही हो और वो गंगाजल में गिर जाये तो भी वो गंगाजल का पानी अपने मुँह में प्रवेश नहीं होने देती है और अपना चोंच बाहर की तरफ निकाल देती है.

आपने तुलसीदास की इस एकनिष्ठ भक्ति का अपमान किया है. इतना बड़ा अपराध करने के बाद भी यदि आपको ये नहीं लगता है कि आपने कुछ भी गलत किया है तो इसी से पता चलता है कि आपका अंत:करण कितना मलिन हो चुका है. ये आपकी निर्लज्जता और ढीठता की पराकाष्ठा है. यदि आपने अपने संघर्ष के दिनों में अपना यह कालनेमि का रूप दिखा दिया होता तो ये आप भी जानते हैं कि आप आज इतनी ऊँचाई पर नहीं पहुँचे होतें. उस समय आपने सिर्फ राम का गुणगान किया और जब लोगों ने आपको अपने दिल में बैठा लिया तो आज आप अपनी इस विशेष स्थिति का नाजायज फायदा उठाते हुए लोगों के दिलों में राम की जगह अल्लाह को घूसेड़ रहे हैं. अब किसी का मन नहीं मान रहा है कि इतना सबकुछ केवल संयोग से, बिना किसी बड़े षड़यंत्र के अपनेआप हो रहा है.

रामायण में एक प्रसंग है कि गौतम ऋषि जब प्रातः काल स्नान करने गये हुए हैं, उस बीच इंद्र गौतम ऋषि का रूप धारण कर उनकी पत्नी अहिल्या के पास आकर अपना परिचय देता है. अहिल्या यह जान जाती हैं कि ये इंद्र है, लेकिन वो यह सोचकर प्रसन्न हो जाती हैं कि मुझे देवताओं का राजा इंद्र प्रेम करते हैं और वह उससे प्रभावित हो उसके साथ सहवास कर लेती हैं. इंद्र जब कुटिया से निकल रहा होता है, तभी वहाँ गौतम ऋषि पहुँच जाते हैं और कुपित होकर इंद्र को अण्डाशय विहीन होने का शाप देते हैं. वो अपनी दुराचारिणी पत्नी पर भी क्रोधित हैं, वो उसे शाप देते हैं कि वो अदृश्य होकर इसी आश्रम में राख के ऊपर हजारों साल तक हवा पीकर उपवास करते हुए पड़ी रहेगी. जब राम और लक्ष्मण यहाँ से गुजरेंगे तब उसका उद्धार होगा और वो पुनः अपने रूप में आकर मेरे पास आ जाओगी. और आगे ऐसा ही होता भी है.

यहाँ अहिल्या इंद्र के साथ एकबार सहवास (वन नाईट स्टे) की हैं, उन्होंने अपने मन में इंद्र को स्थान नहीं दिया है, फिर भी उन्हें हजारों साल का प्रायश्चित करना पड़ा. आपने तो राम के रहते अपना मन अली मौला को दे दिया है. आपके न चाहने पर भी अली मौला आप पर हावी हो जाता है. इस दुराचरण का प्रायश्चित आपको करना ही पड़ेगा. आप इंद्र और गौतम दोनों का मजा एकसाथ नहीं ले सकतें. आपको ये फैसला करना पड़ेगा कि आपको इंद्र के साथ भागना है या गौतम के साथ रहना है. गौतम के साथ दुबारा रहने के लिए आपको अपनेआप को प्रायश्चित्त के आग में तपाना होगा. आपको स्वयं से व्यासपीठ का सम्मान करते हुए, उससे इस जन्म भर के लिए दूरी बना लेनी चाहिए और एकांत में जाकर पुनः राम नाम के जप में मन लगाना चाहिए.

आपको सम्मानपूर्वक स्वयं से प्रायश्चित का मार्ग अपनाना चाहिए, अन्यथा लोग जबर्दस्ती आपसे प्रायश्चित करने पर उतारू हो जायेंगे. आप बहुत ऊँचाई पर बैठे हैं, आपको जमीन की हकीकत दीख नहीं रही है. आज लोगों में वही गुस्सा दिखाई दे रहा है जो गुस्सा भारत विभाजन के बाद गाँधी जी के लिए था. वो भी गुजरात की धरती से निकले बापू थें और आप भी गुजरात की धरती से ही निकले बापू हैं.

मैं नहीं चाहता महात्मा गांधी की तरह दोबारा एक हिन्दू द्रोही या दूसरा बापू बनाकर आपको इस देश पर फिर थोप दिया जाये. हम सबकी मात्र यही अभिलाषा है कि आप आगामी जीवन काल में व्यासपीठ से दूरी बनाकर एकांत में अपने पापों का अंत और प्रायश्चित करें !

आपका पूर्व भक्त

https://bit.ly/2BQtY69

भारतीय सेना के वीर योद्धा

देखिये भारतीय सेनाओं के जांबाजों को , जिनकी जांबाजी के आगे दुश्मन भी दांतों तले उंगलियां दबाने को मजबूर हो जाता है ,आइये एक नजर डालते हैं ऐसे ही वीर जवानों पर-

अरुण खेत्रपाल: टैंक में आग लगने के बावजूद लड़ते रहे

अरुण खेत्रपाल ने पूरे समय एक भी पाकिस्तानी टैंक को वहां से गुजरने नहीं दिया.

ये बात है 16 दिसंबर 1971 की. लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल अपने टैंक से लगातार दुश्मन के दांत खट्टे कर रहे थे. हालात काबू से बाहर होने लगे तो उनके कमांडर ने उन्हें आदेश दिया कि वापस लौटो. अरुण के सामने दुश्मन के कई टैंक बिखरे पड़े थे, जिन्हें उन्होंने ही निशाना बनाया था. खुद अरुण के टैंक में भी आग लगी हुई थी, लेकिन वह पीछे हटने को तैयार नहीं थे. इसी बीच दुश्मन का एक गोला उनके टैंक को निशाना बना देता है और वह शहीद हो जाते हैं. महज 21 साल की उम्र में वह देश की सेवा करते हुए चले गए. दिल्ली के रहने वाले खेत्रपाल के परिवार में उनके दादा पहले विश्व युद्ध और पिता दूसरे और 1965 के युद्ध लड़ चुके हैं. सीमा पर अगर अरुण खेत्रपाल और अन्य जवान टैंक लेकर नहीं जाते, तो पाकिस्तानी टैंकों को रोकना मुश्किल हो जाता, क्योंकि वहा पाकिस्तानी टैंक जमा होने लगे थे. वह जब तक जिंदा रहे, एक भी टैंक उनके टैंक को पार नहीं कर पाया. खेत्रपाल को उनकी इसी वीरता के लिए भारत का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र दिया गया.

होशियार सिंह दहिया: खुद बुरी तरह से घायल थे, लेकिन सेना का मनोबल बढ़ाते रहे

बुरी तरह से घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी सेना के जवानों का मनोबल नहीं गिरने दिया.

हरियाणा के सोनीपत में जन्मे होशियार सिंह दहिया ने 1971 के जंग में अहम भूमिका निभाई थी. उन्हें शकगढ़ सेक्टर में बसंतर नदी पर एक पुल बनाने का काम दिया गया था. नदी दोनों ओर से गहरी लैंडमाइन से ढकी थी और पाकिस्तानी सेना द्वारा अच्छी तरह से संरक्षित थी. उन्हें आदेश मिला कि पाकिस्तानी पोस्ट पर कब्जा करना है. जैसे ही वह आगे बढ़े, पाकिस्तानी सेना ने ताबड़तोड़ हमले करने शुरू कर दिए. भारतीय सेना जवाब दे रही थी. इसी बीच होशियार सिंह एक खाई से दूसरी खाई में भाग-भाग कर अपनी सेना के जवानों का मनोबल बढ़ा रहे थे. पाकिस्तानी सेना हावी हो रही थी, लेकिन गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने पीछे हटने से मना कर दिया और युद्ध विराम तक लड़ते रहे. 1972 में उन्हें सर्वेच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. 6 दिसंबर 1998 में उनकी मौत हो गई, लेकिन उनकी विजय गाथा आज भी लोगों का जज्बा बढ़ा रही हैं.

मेजर सोमनाथ शर्मा: प्लास्टर चढ़े हाथ लेकर जंग के मैदान में कूद पड़े

संसाधन और संख्या कम होने के बावजूद खुले मैदान में शेर की तरह लड़े थे मेजर सोमनाथ शर्मा.

भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर 1947 में हुए युद्ध में मेजर सोमनाथ शर्मा ने दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब दिया था. उनकी वीरता के लिए मरणोपरांत उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. शहीद मेजर सोमनाथ के छोटे भाई लेफ्टिनेंट जनरल सुरेंद्रनाथ शर्मा बताते हैं कि उन्होंने कम संख्या और सीमित संसाधन होने के बावजूद शेर की तरह खुले मैदान में दुश्मनों का सामना किया. उस दौरान उनके हाथ में चोट लगी हुई थी और प्लास्टर चढ़ा था, लेकिन फिर भी वह जंग के मैदान में कूद पड़े. जब दुश्मन उन पर हावी होने लगे तो उन्हें पीछे हटने का आदेश दिया गया, लेकिन उन्होने पीछे हटने से ये कहकर इनकार कर दिया कि ‘दुश्मन हमसे 50 गज की दूरी पर है. हम संख्या में बहुत कम हैं. हम पर बहुत बुरी तरह से हमला हो रहा है, पर मैं एक कदम भी पीछे नहीं हटूंगा और आखिरी राउंड खत्म होने और आखिरी सिपाही के मारे जाने तक लडूंगा.’

कैप्टन विक्रम बत्रा: करगिल का शेर कहा जाता है इन्हें

सूबेदार को पीछे धकेलकर बोले थे- ‘तू तो बाल बच्चेदार है, हट जा पीछे.’

‘या तो मैं जीत का भारतीय तिरंगा लहराकर लौटूंगा या उसमें लिपटा हुआ आऊंगा, पर इतना तय है कि आऊंगा जरूर.’

यही कहकर करगिल युद्ध में गए थे कैप्टन विक्रम बत्रा. विक्रम बत्रा लेफ्टिनेंट के तौर पर सेना में शामिल हुए थे. हम्प व राकी नाब स्थानों को जैसे ही उन्होंने जीता था, उन्हें कैप्टन बना दिया गया. इसके बाद उन्हें श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे अहम 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवानी कि जिम्मेदारी मिली. 20 जून 1999 को उन्होंने पाकिस्तानी सेना को खदेड़ते हुए चोटी पर कब्जा कर लिया. रेडियो से उन्होंने जीत की घोषणा करते हुए कहा ‘ये दिल मांगे मोर’. उनकी इस बात को पूरा देश आज भी याद करता है. उनके कर्नल ने उन्हें शेरशाह का नाम दिया था और 7 जुलाई 1999 को 16000 फुट की ऊंचाई पर दुश्मन से लोहा लेते हुए शहीद हुए कैप्टन विक्रम बत्रा को ‘करगिल का शेर’ की संज्ञा दे दी गई. सूबेदार ने विक्रम बत्रा से आगे नहीं जाने के लिए कहा था, लेकिन विक्रम बत्रा ने सूबेदार को पीछे धकेलते हुए कहा- ‘तू तो बाल बच्चेदार है, हट जा पीछे.’ इसी दौरान एक गोली उनके सीने में जा धंसी और वह शहीद हो गए।

यह तो बानगी भर है ,ऐसे लाखों वीर जवान हमारी सेना मे भरे पड़े हैं जिनके साहस के आगे बड़ी बड़ी सेनाएं अपने को बौना समझती हैं।

दिल्ली दंगे की राजनीति

१८+

किसी की बेशर्मी और बेहयाई पर भला क्या राय दी जा सकती है। छात्र जीवन में एक एडल्ट जोक सुना था यही अमनातुल्ला जैसे लोगो पर लागू होता है। यहां के हिसाब से उसे शेयर करता हूं।

एक पाक बस्ती में एक बार सलीम नाम का अनाथ पहुंच जाता है और दहाड़े मार कर जोर से रोने लगता है। एक औरत उसके पास आती है और रोने का कारण पूछती है। सलीम बताता है कि उसे जीवन में एक दिन के लिए भी किसी औरत का सच्चा प्यार नहीं मिला। उस औरत को दया आ जाती है और वो सलीम को एक दिन के लिए प्यार करती है। इसी तरह से सलीम दूसरी पाक बस्ती में पहुंचता है और यही दोहराता है। वहां भी सलीम को सच्चा प्यार मिलता है। उसी बस्ती में एक आदमी पहुंचता है और औरत से सारी जानकारी लेता है क्योंकि वो सलीम को पहले से जानता होता है। कहानी जानने के बाद वो आदमी उस औरत से बोलता है कि तुम कहां इसके झांसे में आ गई, रो रो कर इसने मेरे बस्ती की सभी औरतों का प्यार पा लिया।

यही बात अमानातुल्ला जैसे लोगो पर लागू होता है। दिल्ली पुलिस ने जो चार्जशीट दाखिल किया है वो किसी मामूली मर्डर का नहीं है जहां उसने किसी को फसाने के लिए कोई कहानी गढ़ी है। ये दंगे की चार्जशीट है जो राष्ट्रीय और विश्व स्तर पर सुर्खियां बटोर चुका है।

चार्जशीट में ताहिर हुसैन दंगे का आयोजक और प्रायोजक दोनों है। टुकड़े गैंग का उमर खालिद ने फंडिंग का जुगाड किया। मरकज के मौलाना साद का करीबी भी दंगे से जुड़ा था। दंगे के दौरान आवाज लगाई जा रही थी कि हिन्दू काफिरों को चुन चुन कर मारो। ये सब चार्जशीट का हिस्सा है जो कम हो सकता है लेकिन ज्यादा नहीं। ताहिर हुसैन के पास लाइसेंस पिस्टल भी है जिसके तीस से ज्यादा कारतूस उसने कहां खर्च किया ये पूछने पर वो खामोश हो गया। अब सभी के जानने योग्य जानकारी के लिए इस विडियो को ३८वे मिनट से देखें जो फैक्ट बेस्ड है:

देर सवेर अमानतुल्ला और पाप पार्टी के बड़े लोगो का नाम भी चार्जशीट में आना चाहिए। बीस साल से मेवात में क्या चल रहा है उसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि इस पर यहां या कहीं कोई चर्चा नहीं है। ये अमनातुला ये भी नहीं जानता होगा कि ये खुद रोहिंग्या को सरकारी जमीन पर बसा रहा है और उनको बिजली पानी राशन भी पहुंचा रहा है पहचान पत्र के साथ।

https://bit.ly/3h7LlPY

अम्बेडकर वाद और उसके विरोधी

किसी को पसंद नापसंद करना उस व्यक्ति का निजी चुनाव हो सकता है मगर नापसंदगी को द्वेष कहना सही नहीं है ।

कोई भी व्यक्ति आलोचना से परे नहीं हो सकता जब लोगों ने गांधी , चर्चिल , स्टॅलिन ,माओ , मार्क्स , रूजवेल्ट और लिंकन जैसे महान नेताओ को पसंद नहीं किया और उनके फैसलो कि आलोचना की तब जाहिर है डॉ अंबेडकर के काम भी कुछ लोगों को पसंद आए और कुछ को नहीं।

हालांकि डॉ अम्बेडकर विश्व नेता से अधिक समाज सुधारक थे । भारतीय जन मानस उनका ता उम्र ऋणी रहेगा कि उन्होंने बंटवारे के वक्त जिन्ना का साथ नहीं दिया और गांधी नेहरू से पुराने मतभेद भुला कर देश और दलित समाज के व्यापक हित को वरीयता देते हुए भारत को चुना अन्यथा उन्ही की तरह एक बंगाली दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल ने तो पाकिस्तान का चुनाव किया । और उधर दलितों के साथ क्या सुलूक हुआ यह दुनिया जानती है मंडल को बेआबरू हो कर भारत लौटना पड़ा और बाकी जीवन उनने गुमनामी में बिताया ।

डॉ अंबेडकर संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्य्क्ष थे जिसका अर्थ है कि उनकी देख रेख में संविधान का ड्राफ्ट तैयार हुआ और डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने उसे मान्यता दी।

यहां यह बात दीगर है कि अम्बेडकर साहब का अपने समय के कुछ नेताओं के साथ विभिन्न मसलों पर मतभेद रहा किन्तु मनभेद नहीं । मगर यह भी सच है कि नेहरू जी ने उनको चुनाव हरवाया था । परन्तु चुनाव होते हैं तो जाहिर है कि कोई जीतता है और कोई हारता है।

उन दिनों नेहरू जी की वह लोकप्रियता थी जो आज मोदी जी की है , और अम्बेडकर जी ने कुछ मसलों पर उनसे विरोध जताया था ।

एक मसला महाराष्ट्र राज्य की स्थापना को ले कर था । नेहरू जी , मुरार जी देसाई और अन्य कांग्रेस नेता भाषाई आधार पर नए राज्यों को बनता देखना नहीं चाहते थे । इसलिए महाराष्ट्र राज्य की मांग करने वालों का उन्होंने दमन किया । हाल इस कदर बिगड़ गए थे कि भारत सरकार के वित्त मंत्री सी डी देशमुख जो भारतीय रिजर्व बैंक के पहले भारतीय गवर्नर भी किसी समय थे उन्होंने नेहरू जी की महाराष्ट्र विरोधी नीतियों को ले कर पद से इस्तीफा दिया था सन १९५६ में , अम्बेडकर जी ने उनका समर्थन किया था हालांकि उसी साल दिसंबर में अम्बेडकर जी चल बसे।

अंबेडकर जी के विरोधी उनको रिज़र्वेशन या आरक्षण लाने का दोष देते हैं मगर उन्होंने यह वयवस्था अधिक से अधिक १० साल तक ही रखने की सिफारिश की थी , यह तो बाद कि सरकार थीं जिन्होंने दलित वोट बैंक पर कब्ज़ा जमाने यह व्यवस्था अब तक जारी रखी है ।

पुतला जलाना प्रदर्शन करना दिल की भड़ास निकालने का जरिया है बस । लोग बाग तो गांधी , नेहरू और प्रधानमंत्री तक का पुतला विरोध प्रदर्शन में जलाते हैं , क्या वह महानता में डॉ अंबेडकर से कहीं कम है ? मगर फिर भी उनका विरोध हुआ ।

मुझे ऐसा लगता है कि डॉ अंबेडकर से अधिक लोग उनके अनुयायियों की हरकतों से नाराज होते हैं ।

आज की तारीख में डॉ अम्बेडकर के नाम पर कई पोलिटिकल पार्टियां और फ्रिंज ग्रुप चल रहे हैं जिनका काम है

१. हिन्दू देवी देवताओं पर भद्दी टिप्पणी करना ।

२. हिन्दू धर्म स्थलों को बौद्ध बताना।

३. हिन्दू धर्म की मान्यताओं को अंधविश्वास का नाम देना ।

४. मनु स्मृति जलाना ।

५. तिलक तराजू तलवार को जूते लगाने की बात करना ।

यह कुछ ऐसे काम हैं जिसकी वजह से लोग डॉ आंबेडकर की राजनैतिक विरासत चलाने वालों से नाराज़ होते हैं ।

https://bit.ly/2MCFlRo

भारत और ईरान की मित्रता

ईरान भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक साझेदार मानता है।

सांस्कृतिक संबंध: फारसी में ईरान का अर्थ “आर्यों की भूमि” है। संस्कृत में भारत के प्राचीन नाम आर्यावर्त का अर्थ भी “आर्यों की भूमि” है। फारसी और हिंदी दोनों में आर्यन का मतलब महान है और इसका नाजी विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है।

यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सिर्फ एक उदाहरण है जो दोनों देशों के बीच रहा है। फारसी और हिंदी भी घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं क्योंकि वे इंडो-ईरानी भाषा परिवार से संबंधित हैं, जो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का एक उपसमूह है।

यह मानचित्र उन देशों को दर्शाता है जहाँ भारत-ईरानी भाषाएं बहुमत से बोली जाती हैं। साथ में यह भाषाएँ 160 करोड़ लोगों द्वारा अपनी मातृभाषा के रूप में बोली जाती हैं।

ईरान के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा शिया मुस्लिम आबादी वाला देश है। इसलिए दोनों देशों के बीच कुछ धार्मिक संबंध भी हैं।

15 फरवरी 2018: ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने भारतीय मुसलमानों के साथ हैदराबाद (भारत) की एक मस्जिद में प्रार्थना की

ऐतिहासिक संबंध: वर्तमान में भारत में 70,000 से अधिक पारसी हैं जो ईरानी मूल के हैं। 7वीं सदी में ईरान में इस्लामी आने के बाद पारसी ईरान से भारत आ गए। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि ईरान में पारसी धर्म पर प्रतिबंध था और इसलिए उनका उत्पीड़न हुआ, लेकिन भारत में उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता दी गई।

यह एक बड़ी त्रासदी है कि पारसियों को ईरान में द्वितीय श्रेणी के नागरिकों की तरह माना जाता था, क्योंकि वे बहुत ही अभिनव और उज्ज्वल लोग थे। लेकिन यह मानवता का एक बड़ा संकेत भी था कि उन्हें भारतीय समाज में स्वीकार किया गया और उनका स्वागत किया गया।

कुछ उल्लेखनीय पारसी हैं:

  • प्रसिद्ध गायक फ्रेडी मर्करी।
  • 1971 के युद्ध में भारत की जीत के वास्तुकार फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ (सैम बहादुर)। वह फील्ड मार्शल नियुक्त होने वाले भारतीय सेना के पहले अधिकारी थे।
  • होमी भाभा, एक प्रसिद्ध परमाणु भौतिक विज्ञानी जिन्हें “भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक” कहा जाता है। वह टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च के संस्थापक थे।
  • जमशेदजी टाटा, टाटा समूह के संस्थापक।

आर्थिक संबंध: ईरान भारत को कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है, और जैसा कि भारत आगे औद्योगिकीकरण कर रहा है, मांग और भी बढ़ेगी। भारत ईरान के तेल और गैस उद्योग के सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में से एक है।

2017 में भारत सरकार की मदद से ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर चाबहार बंदरगाह का विस्तार किया गया था। चाबहार बंदरगाह पाकिस्तान को दरकिनार कर भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करेगा।

चाबहार बंदरगाह पाकिस्तानी “ग्वादर” बंदरगाह का प्रतिद्वंद्वी (rival) है, जिसे चीन की मदद से बनाया जा रहा है। इसके अलावा चाबहार पोर्ट अफगानिस्तान और इसके संबंधित पड़ोसी राज्यों के साथ व्यापार के लिए पाकिस्तान पर भारत की निर्भरता को कम करता है। इसने ईरान और भारत के आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को गहरा किया है।

ईरान के पास विशाल प्राकृतिक संसाधन हैं: ईरान के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस रिजर्व और दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल भंडार है।

केवल रूस में ईरान की तुलना में दुनिया में अधिक प्राकृतिक गैस और तेल है। यह एक कारण है कि भारत ईरान के तेल और गैस क्षेत्र के सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में से एक है।

साझा इतिहास और संस्कृति को देखते हुए ईरान और भारत के बीच बहुत गहरा संबंध है। दोनों राष्ट्र भविष्य के बारे में कई विचार साझा करते हैं। भारत और ईरान बेहतरीन व्यापार भागीदार हैं और भविष्य में शायद और भी बेहतर होंगे।

https://bit.ly/2Ua2T4d

लव जिहाद क्या है, क्या यह हिन्दू विरोधी है?

कुछ लड़के लड़कियां काॅलेज की केन्टीन मे बैठ कर आजकल TV पर चल रहे “लव जिहाद” पर चर्चा कर रहे थे ।

एक लड़की ने कहा: “सब बकवास है यार,… प्रेम में धर्म कहां बीच में आ गया….? प्रेम तो हो जाता है यारों…!!

तब उसीकी एक सहली बोली; “अगर कोई मुस्लिम लड़का तुझे खुद को हिन्दू बता कर फसायें….और वो भी अपने जेहाद, अपने धर्म का लक्ष्य पूरा करने के लिए… और तुझसे शादी करले…. और “शादी के बाद” तुझे पता चले के तेरा पति मुस्लिम है….

बोल, तेरे साथ धोखा हुआ है कि नहीं…..? तुझे कैसा लगेगा …?

वो बोली “ये तो गलत है, धोखा है, Fraud है।”

फिर उस सहेली ने कुछ सवाल किये: “चल, लव जेहाद को छोड़…. तु Broad Minded है, Modern है, Secular है…. और मान ले, तु एक मुस्लिम से शादी कर लेती है….Ok..?

(1) But क्या तू यह सहन कर पायेगी के तेरा पति तुझसे शादी के बाद और 3 बीवीयां लाये…?

क्यूंकि इस्लाम तो 4 शादी की इजाज़त देता है ना..!!

और सुन, मुस्लिम समाज में औरतों को अपने पति को तलाक देने का भी कोई अधिकार नहीं है, जबकि “वो” तुझे केवल 3 बार “तलाक तलाक तलाक” कहकर ही तलाक दे सकता है…!!

वो बोली “बिल्कुल नही मेरा पति सिर्फ मेरा होना चाहिए। यह तो सरासर मुस्लिम महिलाओं का शोषण…. अत्याचार है।

(2) क्या तू चाहती है कि, तू हर साल गर्भवती हो ? और तुझे बच्चे पैदा करने वाली मशीन बना दिया जाये ?

वह बोली “मै.. और हर साल pregnent… हरगिज नहीं…”

(3) क्या तुझे यह पसंद आयेगा कि तेरा पति हफ्ते में सिर्फ जुम्मे (Friday) के दिन ही नहाये…और बाकी के दिनो मे सिर्फ इत्र लगा के घुमे?

“छी छी छी…….सिर्फ हफ्ते में एक दिन नहाये, तो उसे मैं अपने करीब भी ना आने दूं”

(4) क्य तुझे यह पसंद आयेगा की तेरे घर मे रोज किसी निर्दोष जानवर को मारके, काटके, उसका मांस मटन तुझे पकाना पडे….?

कभी कभी तो गाय भी मार के खाते उनके यहाँ…तो, क्या तू गाय खायेगी ?

वो बोली “बिल्कुल नही”

(5) रोज जींस पहन कर कोलेज आती है और शादी के बाद बुर्का पहनना पडे़, तो तू पहनेगी…?

वो बोली “ये तो औरतो को कैद करना जैसा हुआ !”

(6) तुझे पता है मुस्लिम औरत शादी के बाद नौकरी नहीं कर सकती, मौलवी का फतवा है…. और 90% मुस्लिम अपनी बीवी को बुरका के साथ घर की चार दीवारी मै कैद रखते है.चाहे उससे गर्मी में उनकी खाल जलती हो ।

वह बोली “यह कहां का न्याय है..? फिर मैंने जो पढाई की उसका कोई मेल ही नही रहेगा…. मै तो शादी के बाद भी जॉब करना चाहती हुं।

(7) और सुन, क्या तुझे यह पसंद आयेगा की तेरी बेटी का विवाह उसके चाचा, बुआ के बेटे के साथ हो…..?

वो बोली “चाचा और बुआ का लड़का तो भाई होता है…भाई के साथ शादी…?हरगिज नहीं…”

(8) क्या तु जानती है कि यह मुस्लिम शादी के पहले तो चिकने (Clean Shave) रहते है। लेकिन 35 साल की उम्र के बाद ये दाढी रखते है… तो क्या तुझे अच्छा लगेगा की तेरा पति बालों से भरा हुआ रीछ सा लगे ?

वो बोली “छी छी हरगिज नही”

(9) क्या तुझे पता है की मुस्लिम अपनी 10-12 साल की उम्र की लडकी को भी 50-55 साल के बुढ़े आदमी से शादी करवा देते हैं,….क्योकि उनके “अल्लाह मोहम्मद साहब” ने भी अपने दोस्त अबु बकर की 9 साल की बेटी आयशा से शादी की थी….इस्लाम मैं ये बुरा नहीं माना जाता।

वो चौंकी “क्या बात कर रहे हो…?”

चल अब बता कि क्या तुझे “लव जिहाद” का शिकार होना है ?

फिर वो बोली: “Sorry यारों, माना कि प्यार हो जाता है.. लेकिन कोई अपने जेहाद (धर्म बढ़ाने की बड़ी योजना) के लिए प्यार जैसे पवित्र रिश्ते को भी बदनाम करे….और जिदंगी भर का दुख दे, तो यह मुझे स्वीकार नही,…..

शादी इन्सान के जीवन में बहुत महत्व रखती है शादी जैसा पवित्र रिश्ता तो बहुत सोच समझ कर करना चाहिए…

हमारे संस्कारों में तो शादी एक बार ही होती है बार बार नहीं….मैं तो समझ गई…. और अब मै मेरी और भी हिन्दू सहलियों को समझाऊगी…. Alert करुगी….. यह Msg Forward करुगी….”

सावधान: “लव जेहाद योजना” में बहुत सी हिन्दू लड़कियां को प्रेम के जाल में मुसलमान लड़के अपना हिन्दु नाम रख कर फँसा रहे है,…शादी कर रहे है । और फिर….भगवान मालिक ।

सही लगता है तो plz 2-4 को pForward करो….

और किसी हिन्दु बहन या बेटी की जिदंगी नरक बनने से बचाओ ।

https://bit.ly/3eKAbyB

क्या वर्तमान स्थिति में साम्यवादी चीन भारत को युद्ध में हरा सकता है ?

जब कभी कोई हमें हमारा भूतकाल बताता है तो तब हम भूतकाल की यादों में खो जाते हैं और अपनी कार्य क्षमता अपना स्वर्णिम इतिहास भूल जाते हैं।अधिकतर हम सुनते हैं कि पाकिस्तान से तो तीनों युद्ध जीत गए लेकिन चीन से 1962 का युद्ध हम हार गए प्रत्येक भारतीय इसे कलंक की तरह लेता है।

लेकिन फिर वही परेशानी आधा अधूरा ज्ञान 1962 के बाद भी चीन से हमारी सेना तीन लड़ाई हुई थी और तीनों ही लड़ाई में भारतीय सेना ने चीन के सैनिकों को नाकों चने चबाए थे।

1. 1967 नाथूला दर्रा की लड़ाई:- यह लड़ाई की कमान 2 ग्रेनेडियर्स बटालियन को सौंपी गई 11 सितंबर 19 67 को भारत और चीन के बीच सैनिकों में तारबंदी को लेकर लड़ाई हुई चीनी सैनिकों ने मीडियम मशीन गन से भारतीय सैनिकों पर गोली बरसानी शुरू कर दी प्रारंभ में भारत के 70 सैनिक मारे गए इसके बाद भारत के जवानों ने जवाबी कार्यवाही की भारत की आर्टिलरी का पावरफुल प्रदर्शन 3 दिनों तक जारी रहा इसमें चीन के कई बंकर ध्वस्त कर दिए गए और चीन के 400 सैनिक मारे गए चीन की मशीन गन यूनिट भी बर्बाद कर दी गई 15 सितंबर को दोनों देशों के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की मौजूदगी में शवों की अदला-बदली की गई और इस लड़ाई पर विराम लगा दिया गया इस लड़ाई में भारत का पलाड़ा चीन के मुकाबले कहीं ज्यादा ज्यादा भारी रहा (भारत के जनता ने इस इतिहास क्षण को भुला दिया) ।

2. 1967 की भारत चीन की दूसरी लड़ाई (चोला दर्रा):-1 अक्टूबर 1967 चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने दोबारा भारत की चौकी पर हमला किया और सितंबर 1967 के संघर्षविराम को तोड़ दिया । वहां मौजूद 7 / 11 गोरखा राइफल और 10 जैक राइफल नामक भारतीय बटालियन ओने चीन का हमला नाकाम किया 17 माउंटेन डिवीजन के मेजर सगत सिंह ने नाथूला और चोला दर्रा की सीमा पर बाड़ लगाने का काम शुरू कर दिया इस लड़ाई में कर्नल रॉय को महावीर चक्र और शहादत के बाद कैप्टन डागर को वीर चक्र और मेजर हरभजन सिंह को महावीर चक्र दिया गया।

1967 के यह दो सबक आज भी चीन को सीमा पर गोली चलाने से रोकते हैं इसीलिए भारत चीन सीमा पर सैनिकों में प्राया धक्का-मुक्की होती है कोई गोली नहीं चलाता।

(भारत की जनता ने इतिहास के इस लड़ाई को भी बुला दिया)

3. 1987 की भारत चीन की तीसरी लड़ाई:- 1967 के 20 साल बाद 1987 में चीन को एक बार फिर झटका लगा जब भारत की सेना ने चीन को फिर सबक सिखाया इस संघर्ष की शुरुआत तवांग के उत्तर में सम गौरांग चू रीजन में 1986 में हुई थी उस समय भारत के जर्नल कृष्णस्वामी सुंदर जी के नेतृत्व में ऑपरेशन फलकन हुआ था । समदोरंग चू और नामका चू दोनों नाले इस उत्तर से दक्षिण को बहने वाली नयामजंग चू नदी में गिरते हैं. 1985 में भारतीय फौज पूरी गर्मी में यहां डटी रही, लेकिन 1986 की गर्मियों में पहुंची तो यहां चीनी फौजें मौजूद थीं. समदोरांग चू के भारतीय इलाके में चीन अपने तंबू गाड़ चुका था, भारत ने पूरी कोशिश की कि चीन को अपने सीमा में लौट जाने के लिए समझाया जा सके, लेकिन अड़ियल चीन मानने को तैयार नहीं था।

भारतीय सेना ने ऑपरेशन फाल्कन तैयार किया, जिसका उद्देश्य सेना को तेजी से सरहद पर पहुंचाना था. तवांग से आगे कोई सड़क नहीं थी, इसलिए जनरल सुंदर जी ने जेमीथांग नाम की जगह पर एक ब्रिगेड को एयरलैंड करने के लिए इंडियन एयरफोर्स को रूस से मिले हैवी लिफ्ट MI-26 हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करने का फैसला किया

भारतीय सेना ने हाथुंग ला पहाड़ी पर पोजीशन संभाली,जहां से समदोई चू के साथ ही तीन और पहाड़ी इलाकों पर नजर रखी जा सकती थी. 1962 में चीन ने ऊंची जगह पर पोजीशन लिया था, परंतु इस बार भारत की बारी थी. जनरल सुंदर जी की रणनीति यही पर खत्म नहीं हुई थी. ऑपरेशन फाल्कन के द्वारा लद्दाख के डेमचॉक और उत्तरी सिक्किम में T -72 टैंक भी उतारे गए. अचंभित चीनियों को विश्वास नहीं हो रहा था. इस ऑपरेशन में भारत ने एक जानकारी के अनुसार 7 लाख सैनिकों की तैनाती की थी. फलत: लद्दाख से लेकर सिक्किम तक चीनियों ने घुटने टेक दिए. इस ऑपरेशन फाल्कन ने चीन को उसकी औकात दिखा दी. भारत ने शीघ्र ही इस मौके का उठाकर अरुणाचलप्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया।

(भारत की जनता ने भारत की इस ऐतिहासिक लड़ाई को भी भुला दिया)

(अब तक मैंने आपको भूत काल में भारत की स्थिति दिखाई अब हम बात करेंगे वर्तमान काल में चीन के सम्मुख भारत की क्या स्थिति है ।)

1. भारत की भौगोलिक स्थिति:-भारत की भौगोलिक स्थिति को देखें तो चीन की आर्मी टैंकों और भारी आर्टलरी को लेकर भारत के दर्रे को पार करना आसान नहीं है और यदि चीन की आर्मी ऐसा करती भी है भारत की सेना को मैदानी इलाकों में जल्दी reinforcement मिल जाएगा जिससे वह अपनी मिसाइलें तैनात करके इस मार्ग को बंद कर सकती है। 1962 के युद्ध में चीन ने भारत पर हल्के हथियारों मशीन गन हल्की आर्टलरी गनो से हमला किया था। भारतीय सेना भारत और चीन कि सीमाओं पर अच्छी स्थिति में हैं।

2. चाइना की एयर फोर्स:- चाइना की एयर फोर्स यदि हिमालय को पार करके भारत की तरफ आती भी है तो भारत की एयर फोर्स और भारतीय एयर डिफेंस के combo का उनके पास कोई जवाब नहीं है भारत का एयर डिफेंस सिस्टम मल्टीलेयर है इसके अलावा भारत के फाइटर प्लेन किसी भी युद्ध की स्थिति को बदलने में सक्षम है।

3. चाइना की नौसेना:- चाइना की नौसेना यदि दक्षिणी चीन सागर से हजारों किलोमीटर चलकर भारत के हिंद महासागर यह बंगाल की खाड़ी में आती है तो उसे भारतीय नौसेना और पी 8 आई नेविगेशन प्लेन और भारतीय रडार से स्वयं को कैसे बचा पाएंगे खुले हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में चीन की नौसेना भारत की नौसेना का मुकाबला शायद ही कर पाएगी इसके अलावा भारत की कोस्टलाइन बहुत बड़ी है इसका भी भारत को फायदा होगा और सबसे महत्वपूर्ण अंडमान निकोबार की स्थिति यह भारतीय नौसेना का ट्रंप कार्ड है ।

4. Indian Air force, ground force, anti ship missile, का भी इंडियन नेवी को पूरा सहयोग मिलेगा इस चक्रव्यूह को शायद ही चीन तोड़ पाए।

5. मलक्का जलसंधि:-चीन हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी की तरफ से यदि नहीं आता है तो उसके पास दूसरा रास्ता मलक्का जल संधि है यह एक सकरा रास्ता है यदि चीन इस रास्ते से आता है तो भारत के कुछ anti-ship और डिस्ट्रॉयड पूरी नो नौ सेना को रोकने में सक्षम है।

6. यदि चीन भारत पर इन सब बातों के विपरीत भी युद्ध करता है तो साउथ चाइना सी के देश भारत को भरपूर सहयोग देंगे।

7. वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को देखते हुए अमेरिका

जापान और ऑस्ट्रेलिया भी भारत को युद्ध की स्थिति में सहयोग देंगे।

अंत में

सदैव अतीत की बात करने वाला साम्यवादी चीन 1967 से 1987 उपयुक्त समय भारत के सम्मुख घुटने टेकता ही आया है यदि हम तुलनात्मक अध्ययन करें तो वियतनाम युद्ध के बाद चीन ने कोई युद्ध नहीं लड़ा है हिमालय की सरद पर उसे युद्ध लड़ने का कम अनुभव है जबकि दूसरी तरफ भारत पाकिस्तान से चार युद्ध लड़ चुका है इसके अतिरिक्त वह सदैव युद्ध की स्थिति में रहता है हिमालय के क्षेत्रों में भी भारत को युद्ध का अच्छा खासा अनुभव है और अंत में एशिया में भारत सबसे अधिक युद्ध अभ्यास करने वाला देश है।

यदि भारत चाइना के सामने जरा भी कमजोर स्थिति में होता तो वह चीन के हेलीकॉप्टर के आते ही अपना सुखोई एमकेआई फाइटर प्लेन नहीं उड़ाता ऐसा लगता है चीन से ज्यादा भारत अग्रेसिव है।

तुलनात्मक तौर पर भारत चीन के समक्ष भले ही कमजोर लग सकता है, परंतु वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है. 1967 के दोनों युद्धों से स्पष्ट है कि अपनी विशिष्ट एवं अचूक रणनीति के द्वारा भारत न्यूनतम संसाधनों के बीच भी चीन को हराने में सक्षम हैं।

फोटो गूगल ,चित्र गूगल

आशा करता हूं नये भारत चीन का यह नया तुलनात्मक अध्ययन आपको पसंद आएगा यदि मेरे लेख में कोई त्रुटि है उसके लिए क्षमा सम्मान पूर्वक टिप्पणी का जवाब जरूर दिया जाएगा।

ज्ञान के इस यज्ञ में मेरी तरफ से एक छोटी सी आहुति…

धन्यवाद

https://bit.ly/3cvR8vo

क्या कारण है कि ताजमहल को ही सात अजूबों में शामिल किया गया है? क्या भारत में उससे अद्भुत और आश्चर्यकारी कुछ नहीं है?

आप आश्चर्य करेंगे कि भारत में मूर्तिकला इतने उच्च स्तर पर थी कि उसके सामने ताजमहल शून्य के बराबर है।

अकेला कर्नाटक में बेलूर का चेन्नकेशव मंदिर का स्थापत्य और मूर्तिकला इतनी उत्कृष्ट है कि कल्पना नही की जा सकती कि सचमुच हजार साल पहले भारत इस मामले में इतना विकसित रहा होगा।

सोचिए कि औरंगाबाद का कैलाश मन्दिर सिर्फ एक चट्टान से बना है। इसका निर्माण शिखर से शुरू होकर तहखाने तक हुआ।

भारत में एक से एक अद्भुत मन्दिर हैं लेकिन आज़ादी के बाद सांस्कृतिक,ऐतिहासिक संस्थाओं पर वामपंथियों का कब्जा हो गया,जो हिन्दू विरोधी थे,उन्होंने हिन्दू धर्म के प्रति अपनी घृणा के चलते इन्हें विश्व के सामने या देश के सामने आने नही दिया।

चेन्नकेशव मन्दिर बेलूर।

होयसालेश्वर मन्दिर हलेबीड़ू कर्नाटक।

कैलाशा मन्दिर,एलोरा महाराष्ट्र।

यह मंदिर एक ही चट्टान से बना है।

वेंकटेश्वर मन्दिर तिरुमला, आंध्र प्रदेश।

मीनाक्षी मन्दिर तमिलनाडु।

मीनाक्षी मन्दिर की बेहतरीन कलाकारी।

विरुपाक्ष मन्दिर हंपी।

चेन्नकेशव मन्दिर की मूर्तिकला।

यह भी

यह भी चेन्नकेशव मन्दिर की कारीगरी का नमूना है।

रामेश्वरम मंदिर।

हलेबीड़ू मन्दिर, कर्नाटका।

ये कुछ ही मन्दिर हैं जो अपनी अद्भुत मूर्तिकला के लिए जाने जाते हैं।

ऐसे हजारों मन्दिर हैं जो श्रद्धालुओं की नजरों से ओझल हुए हैं।

https://bit.ly/3gNbZgZ

Halal: How Non-Muslims are Being Forced to Pay for Islamic Expansion

In India, a country known to have a Hindu majority, meat vendors such as Licious and FreshToHome are selling only halal meat to their customer base, despite the fact that it is comprised of Hindus, Chritians, Sikhs, atheists, as well as, of course, Muslims.

In the United States, the Mayor of New York, Bill de Blasio, promises the availability of halal food to Muslims, while warning the Jews to cancel any celebrations. This, again, is a country with a majority of non-Muslim citizens.

Eateries including McDonalds, KFC, Subway and Pizza Express are international brands, operating across countries of different cultures, and cater to customers of all faiths, but have decided to go halal in many areas in order to court their Muslim buyers exclusively.

If you are based in the Americas, Europe, Australia or New Zealand, and are specifically and explicitly being offered halal meat only, know that you are being deceived and compelled to sponsor the purpose of Islam and its expansion, and could be involuntarily financing jihad in its many forms.

What is halal and Halal Certification?

The halal cut is the only method in which an animal can be slaughtered as dictated in the Islamic texts. The process of killing an animal by following the halal norms is as brutal as it gets; it subjects the animal to a prolonged and painful death, and it is appalling that animal welfare organizations such as PETA have done nothing about it yet.

For the uninitiated, the jugular vein, windpipe, or carotid artery of an alive and healthy animal is pierced and cut halfway through, and the animal is left aside till its body drains out all the blood. A Muslim recites an Islamic prayer during this process, and dedicates the animal or the meat obtained from its slaughter to Allah. This Islamic prayer is known as shahada or tasmiya. Here it must be noted that only a Muslim can perform the act of slaughter.

The finished products then are given a Halal Cerificate, which is a document issued by the Muslim authorities based in the exporting country. The Halal Certification attests that the food product in question fulfills the requirements necessitated by Islamic law for its consumption.

The discrimination rooted in the halal industry

While the progressive world evoked by the liberals can’t stress equality enough, imagine a thriving industry that employs people belonging to only one religion or faith system flourishing among us. Yes, that is the discriminatory world of halal, which is being thrust upon many societies of the world whether or not they have a Muslim majority.

By selling a commodity that has an Islamic prayer recited upon it, and has been dedicated to Allah, the vendors of halal products are imposing Islam on all their non-Muslim consumers.

The multi-million-dollar halal industry thriving on money shelved out by Christians, Hindus, Sikhs and all faith systems including atheists, deliberately, and as a principle, employs only Muslims. If this is not a screaming specimen of discrimination practiced by employers, I wonder what is. The halal industry operating in meat- and animal-related products by design and intention denies equal employment opportunity to able and skillful labors, solely for not being the followers of Islam.

This discrimination is not limited to the act of slaughtering the animal alone. As an industry, halal-certified food items go through various rounds of processing, namely, chopping and mincing, washing and cleaning, packaging, labeling, and other logistic services. The Islamic diktat mandates that every individual involved in each of these steps to be a Muslim for the finished product to be considered halal. In other words, it is a well-calculated deceit aimed at concentrating the accumulation of wealth to followers of only one religion.

By throwing their intolerant and insatiable tantrums, Muslims in countries with non-Muslim majorities have twisted the arm of secular systems in their favor. Islamic fundamentalists recognize the shame instilled in the hearts of civilized societies about being tagged Islamophobes, racists, and all other such epithets. They exploit this to the fullest until non-Muslims concede to their unfair demands.

A practice that was initially limited to the processing of non-vegetarian food, the halal monopoly, after occupying massive portions of the markets for non-vegetarian food, has made inroads into the vegetarian domain also. Spices, vegetable oil, cereals and many other grocery products that you may find at your local store bear the halal mark. Though non-Muslims are permitted in the production of these items, the halal certification authority employs Muslims explicitly, and levies a fee for inspecting the food product and issuing it the Halal Certificate. It is a business operation that generates money off all these vegetarian and non-vegetarian products by monopolizing the certification process.

Many Muslims won’t eat anything that’s not halal, while non-Muslims generally don’t care. That is how the entire population worldwide is playing into the hands of the Islamists. Just by buying a sandwich from your regular sandwich shop or preparing a meal for your family, you could be making Islamists wealthy. This wealth can then be invested in the service of Islam, its expansion, its religious ambition of world domination and more.

So non-Muslims may want to consider all the pros and cons before they buy halal.

Source: https://bit.ly/2BjTOiF

Why is “#Hinduphobic_Bollywood” trending on Twitter?

Source: https://bit.ly/2zP2ixY

So I was watching ‘Paatal Lok’ the other day. I was excited for this web series as I was a fan of Sudip Sharma’s work in the past (Udta Punjab, NH10).

What an utter disappointment the series turned out to be!

The story was average, apart from it while watching the show I felt like I was watching some anti-Hindu propaganda produced by NDTV. This wasn’t expected from Anushka Sharma.

  • There is a politician called ‘Bajpayee’ who belongs to a party whose symbol is a flower and is the main villain in the series.
  • Morphed image of UP’s CM Yogi Adityanath with MLA Nandkishore (which was later changed after an FIR filed against Anushka, but you get my drift).
  • Cliched ‘minority’ victimization. They’ve become what they are because of the bad things done by the Hindus.
  • A lynching scene where the mob thrashes a man while chanting Jai Shree Ram.
  • There is a useless scene where an ‘extremist’ Hindu is served some non-veg while he is standing in front of a Devi’s idol. And he eats it with all his heart.
  • Tiwari, Bajpayee, Gujjar are the bad guys. Ansari is an honest hard-working officer.
  • Later in the series it is revealed that a character is Muslim but hides his religion because he fears for his safety. It’s like a personification of an absurd statement made by Aamir Khan a few years ago. Worth scoffing!

Paatal Lok was 9 episode long; the series could’ve been finished within 4 episodes. They kept a good 5 episodes just for showing Hindus in the bad light.

Well, you can only make a hindu bashing series in a country where the majority of the population is Hindu. But then you call us intolerant?

This tweet sums it all up-


If this isn’t Hinduphobia by the pseudo left ‘liberals’ then I don’t know what is. This hashtag should’ve started trending long while ago.


मध्यम वर्ग के हित देश व्यापी बंद में?

मध्यम वर्ग के नैतिक मूल्य उँचे होते हैं , लड़ाई झगड़े मार पीट से कोसो दूर होता है क्योंकि उसे अपनी और परिवार की इज़्ज़त प्यारी होती है फिर चाहे वह जिस भी धर्म मज़हब और पंथ का हो |

इस मध्यम वर्ग हेतु कांग्रेस भाजपा और अलानी फलानी पार्टी के किसी भी नेता ने कभी भी गंभीरता पूर्वक विचार नहीं किया | सरकारी योजनाएँ या तो धन पशुओं के हितों में बनतीं हैं या कथित ग़रीबी की रेखा से नीचे रहने वाले मजदूर किसानों के |

मध्यम वर्ग के साथ सदैव सौतेला व्यवहार किया जाता है और रहेगा | जो केबल ओपरेटरस , मीडिया शनेल और संस्थान लॉक डाउन के दौरान भी पुराने कार्यक्रम दिखा कर ‘पूरी पूरी’ कीमत वसूलते हैं वह

१. कोरोना से हुई मौतों को दिखा दिखा कर नकारात्मकता फैलाते हैं|

२. लॉक डाउन तोड़ते लोगों की तस्वरे दिखाते हैं |

३. पैदल चलते मजदूरों को दिखाते हैं रोक कर इंटेरव्यु लेते हैं |

४. यात्रा के दौरान रास्ते में ढहते मजदूरों की तस्वीरे दिखा कर |

५. सूटकेस पर सोते ब्च्हचों की तस्वीरें दिखा कर|

६. गाड़ियों और ट्रेनों से कुचले जाते मजदूरों की तस्वीरें दिखला कर |

७. अकेले मजदूरों और ग़रीबों की ही हालात दिखा दिखा कर |

तमाम लोगों को भावनात्मक रूप से ब्लॅकमेल कर , सरकार और व्यवस्था के खिलाफ माहौल बना कर , अपना उल्लू सीधा करते हैं !

कई चॅनेल्स ने तो अब अपने दर्शकों से ( जो अधिकतर मध्य वर्ग के ही होते हैं ) चंदा माँगना शुरू कर दिया है कोरोना फंड के नाम पर |

इसी तरह धन पशुओं की कंपनियाँ और विदेशी कंपनियाँ कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिलिटी के तहत कोरोना फंड स्थापित किए हैं जिनके बदौलत चंदा एंप्लायी दें ( जो अधिकतर मध्य वर्ग के हैं ) और वह चंदा यह लोग सीएसआर प्रोग्राम के तहत सरकार को दें , जिससे इनकी इमेज चमक गयी , बोर्ड और कपनियों के मालिकान की जेब से एक आंटा खर्च न हुआ , एक इवेंट करा कर कंपनियों का सीईओ अथवा डाइरेक्टर किसी मंत्री क्लेक्टर के साथ फोटो खींचा लेगा , नये सरकारी ठेके लेगा , तो साहब इस तरह से हींग लगेगी न फिटकरी रंग चोखा आएगा !

कई कई कंपनियों ने तो एंप्लायी को निकालना शुरू किया है काम से ! एमपलोई की सहमति के बगैर उनकी सॅलरी काटना शुरू किया , या अगर सॅलरी सीधे रूप से न काटी तो , हज़ार दो हज़ार रुपये सलारी से कंपनी के कोरोना फंड में काट लिए गये !

कंपनियाँ जो अपने एमपलोई का बीमा कराती है अप्रैल तक अनेक बीमा कंपनियों ने कोरोना कवर देने से मना किया | जब विरोध प्रदर्शन हुए तब दिया |

सोचिए अब आप ! काम करने के बाद हक के पैसे पूरे नहीं मिलते , जो मिलते हैं उसमें भी काट लिए जाते हैं ! मध्य वर्ग का इंसान जाए तो कहाँ जाए , करे तो क्या करे ?

इतना होने के बाद भी मीडिया और सरकार और सब को अकेले उन ‘कथित; ग़रीब मजदूरों का दुख ही दिखता है !

चलो मजदूरों की सहयता के लिए तमाम एनजीओ खड़े हो जाएँगे कम्युनिस्ट पॉलिटिकल पार्टी खड़े हो जाएँगे |

मीडिया इनकी आवाज़ बन जाएगा , मगर मध्य वर्ग !

कौन है उसका पैरवी करने वाला ? उसे तो अपनी लड़ाई , खुद ही लड़नी है ! कोई नहीं है उसका पक्षकार !

मजदूर को उसकी मज़दूरी के पैसे कम दे कर देखिए , सात पुश्तों को याद करेगा आपकी ! होली दीवाली पर बोनस देर से दे कर देखिए ! या तो फिर अधिक देर तक कम करने को कहिए ! वह चाहे काम करे न करे मज़दूरी आपको पूरी देनी होगी !

ठेकेदार भी नहीं पड़ेगा बीच में , और यदि काम के डोआरन हादसा हो गया तो ज़िम्मेदारी आपकी !

मध्य वर्ग की हालत सैंड विच के चटनी जैसी हुई है जो ब्रेड के दोनो स्लाइस का स्वाद बढ़ाती है , मगर बेचारी खुद पिस जाती है !

https://bit.ly/2MdPBzu

जरूरी बात

अपनी बात कहने से पहले, मैं एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता हूँ :
मेरे एक परिचित हैं। उनकी अपनी एक दुकान, बेहद महत्वपूर्ण जगह पर स्थित है।
दुकान के सामने उन्होंने एक काम चलाऊ छत बनाई और वह जगह, जो वास्तव में नगरपालिका की थी, भी अपने परिचित को किराये पर दे दी।
किरायेदार ने जगह की जरूरत को ध्यान में रखते हुए चाय और फलों का जूस बेचना शुरू कर दिया। जगह का मासिक किराया ढाई हजार रुपये था।
इस सब के अलावा शाम को घर की तरफ चलते समय थैली में करीब आधा लिटर जूस लेकर जाते थे, जिसका कभी कोई पैसा नहीं दिया। उन्हें कभी भी ऐसा नहीं लगा कि यह फ्री का जूस घर ले जाने में कोई नैतिकता की गाँठ गले में अटक रही है।
————-
अब अपनी बात कहूँगा :
एक परिवार में, माता पिता की जो औलाद पैदा होती है (बेटा हो या बेटी) उसकी चार अलग-अलग कैटिगरी हैं :
(1) पिछले जन्म का दुश्मन है, जिसने बेटे के रूप में जन्म लिया है। अब अपना बदला लेगा।
(2) पिछले जन्म का कर्जदार है, जिसने बेटे के रूप में जन्म लिया है। अब अपना पैसा (मय ब्याज के) वसूल करेगा।
(3) यह तटस्थ है। बड़ा होकर, पढ़ लिख कर शादी ब्याह के बाद घर छोड़कर चला जायेगा और फिर कभी वापस नहीं आयेगा।
(4) माता पिता का सेवक है। उनके आखिरी साँस तक, हर प्रकार से उनकी सेवा करेगा।
———–
तो सवाल पूछते समय, जिस बेटे का बिम्ब आपके दिमाग में बना हुआ है :वह आया ही अपना कर्ज वसूलने के लिए। इसलिए उसे छोटा मोटा काम करने की कोई आवश्यकता नहीं है। काम करेंगें उसके पिता जी, वो तो इस दुनिया में आया ही अपने बाप के पैसे पर ऐश लेने के लिए।।


इसलिए एक बेहद प्रचलित देहाती कहावत है :

जिसका उधार लिया है, हाथ जोड़कर दे दो। नहीं तो, अगले जन्म में (मय ब्याज के) बाह बाह कर देना पड़ेगा।

यह कहावत क्योँकि खेती की दुनिया से जुड़ी हुई हैं,

” बाह बाह कर देना पड़ेगा “

से अभिप्राय है :

बैल बनकर हल खींचना पड़ेगा, (परन्तु कर्ज की तो दमड़ी दमड़ी चुकानी ही पड़ती है) ।।

https://bit.ly/3eHxKNB

प्रेरणादायक बात

एक बार एक व्यक्ति रेगिस्तान में कहीं भटक गया ।

उसके पास खाने-पीने की जो थोड़ी बहुत चीजें थीं, वो जल्द ही ख़त्म हो गयीं थीं।

पिछले दो दिनों से वह पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा था।

वह मन ही मन जान चुका था कि अगले कुछ घण्टों में अगर उसे कहीं से पानी नहीं मिला तो उसकी मौत निश्चित है ।पर कहीं न कहीं उसे ईश्वर पर यकीन था कि कुछ चमत्कार होगा और उसे पानी मिल जाएगा।तभी उसे एक झोँपड़ी दिखाई दी।

उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ।पहले भी वह मृगतृष्णा और भ्रम के कारण धोखा खा चुका था।पर बेचारे के पास यकीन करने के अलावा कोई चारा भी तो न था।आखिर यह उसकी आखिरी उम्मीद जो थी।वह अपनी बची खुची ताकत से झोँपडी की तरफ चलने लगा।जैसे-जैसे वह करीब पहुँचता, उसकी उम्मीद बढती जाती और इस बार भाग्य भी उसके साथ था।

सचमुच वहाँ एक झोँपड़ी थी।पर यह क्य ?झोँपडी तो वीरान पड़ी थी।मानो सालों से कोई वहाँ भटका न हो।फिर भी पानी की उम्मीद में वह व्यक्ति झोँपड़ी के अन्दर घुसा।अन्दर का नजारा देख उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ।

वहाँ एक हैण्ड पम्प लगा था। वह व्यक्ति एक नयी उर्जा से भर गया।पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसता वह तेजी से हैण्ड पम्प को चलाने लगा।लेकिन हैण्ड पम्प तो कब का सूख चुका था।

वह व्यक्ति निराश हो गया, उसे लगा कि अब उसे मरने से कोई नहीं बचा सकता।वह निढाल होकर वहीं गिर पड़ा।तभी उसे झोँपड़ी की छत से बंधी पानी से भरी एक बोतल दिखाई दी।वह किसी तरह उसकी तरफ लपका और उसे खोलकर पीने ही वाला था कि…

तभी उसे बोतल से चिपका एक कागज़ दिखा उस पर लिखा था –

इस पानी का प्रयोग हैण्ड पम्प चलाने के लिए करो और वापिस बोतल भरकर रखना ना भूलना ?

यह एक अजीब सी स्थिति थी।

उस व्यक्ति को समझ नहीं आ रहा था कि वह पानी पीये या उसे हैण्ड पम्प में डालकर चालू करे।उसके मन में तमाम सवाल उठने लगे,अगर पानी डालने पर भी पम्प नहीं चला तो। अगर यहाँ लिखी बात झूठी हुई।और क्या पता जमीन के नीचे का पानी भी सूख चुका हो तो।लेकिन क्या पता पम्प चल ही पड़े,क्या पता यहाँ लिखी बात सच हो,वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे?

फिर कुछ सोचने के बाद उसने बोतल खोली और कांपते हाथों से पानी पम्प में डालने लगा।

पानी डालकर उसने भगवान से प्रार्थना की और पम्प चलाने लगा।एक, दो, तीन और हैण्ड पम्प से ठण्डा-ठण्डा पानी निकलने लगा।वह पानी किसी अमृत से कम नहीं था।उस व्यक्ति ने जी भरकर पानी पिया, उसकी जान में जान आ गयी।दिमाग काम करने लगा।उसने बोतल में फिर से पानी भर दिया और उसे छत से बांध दिया।जब वो ऐसा कर रहा था, तभी उसे अपने सामने एक और शीशे की बोतल दिखी।खोला तो उसमें एक पेंसिल और एक नक्शा पड़ा हुआ था, जिसमें रेगिस्तान से निकलने का रास्ता था।उस व्यक्ति ने रास्ता याद कर लिया और नक़्शे वाली बोतल को वापस वहीँ रख दिया।

इसके बाद उसने अपनी बोतलों में (जो पहले से ही उसके पास थीं) पानी भरकर वहाँ से जाने लगा।कुछ आगे बढ़कर उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा।फिर कुछ सोचकर वापिस उस झोँपडी में गया,और पानी से भरी बोतल पर चिपके कागज़ को उतारकर उस पर कुछ लिखने लगा।

उसने लिखा – *”मेरा यकीन करिए यह हैण्ड पम्प काम करता है”*यह कहानी सम्पूर्ण जीवन के बारे में है।

यह हमें सिखाती है कि बुरी से बुरी स्थिति में भी अपनी उम्मीद नहीं छोडनी चाहिए।और इस कहानी से यह भी शिक्षा मिलती है कि कुछ बहुत बड़ा पाने से पहले हमें अपनी ओर से भी कुछ देना होता है।जैसे उस व्यक्ति ने नल चलाने के लिए मौजूद पूरा पानी उसमें डाल दिया।देखा जाए तो इस कहानी में पानी जीवन में मौजूद महत्वपूर्ण चीजों को दर्शाता है।कुछ ऐसी चीजें हैं जिनकी हमारी नजरों में विशेष कीमत है।किसी के लिए मेरा यह सन्देश ज्ञान हो सकता है,

तो किसी के लिए प्रेम,तो किसी और के लिए पैसा।यह जो कुछ भी है, उसे पाने के लिए पहले हमें *अपनी तरफ से* उसे *कर्म रुपी हैण्ड पम्प* में डालना होता है और फिर *बदले में* आप अपने *योगदान से कहीं अधिक* मात्रा में उसे *वापिस पाते* हैं।🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

वामपंथी दल और भारत में उनका भविष्य

वामपंथ की पहली प्रयोगशाला यूएस एसआर को माना जा सकता है। कहीं है दुनिया के नक्शे पर?

दूसरी प्रयोगशाला चीन है। अगले दस सालों में उसके भी टुकड़े होना निश्चित है।

इन दोनों महादेशों ने वामपंथ को अलविदा कह दिया है।

*कड़वा सच* 😟

एक जमाना था ..

कानपुर की “कपड़ा मिल” विश्व प्रसिद्ध थीं ।

कानपुर को “ईस्ट का मैन्चेस्टर” बोला जाता था।

कानपुर की फ़ैक्टरी के महीन सूती कपड़े प्रेस्टीज सिम्बल होते थे।. वह सब कुछ था जो एक औद्योगिक शहर में होना चाहिए।

मिल का साइरन बजते ही हजारों मज़दूर साइकिल पर सवार टिफ़िन लेकर फ़ैक्टरी की ड्रेस में मिल जाते थे। बच्चे स्कूल जाते थे। पत्नियाँ घरेलू कार्य करतीं । और इन लाखों मज़दूरों के साथ ही लाखों सेल्समैन, मैनेजर, क्लर्क सबकी रोज़ी रोटी चल रही थी।

__________________________

फ़िर “कम्युनिस्टों” की निगाहें कानपुर पर पड़ीं.. तभी से….बेड़ा गर्क हो गया।

“आठ घंटे मेहनत मज़दूर करे और गाड़ी से चले मालिक।” कम्युनिस्टों ने यह नारा दिया।

ढेरों हिंसक घटनाएँ हुईं,

मिल मालिक को दौड़ा दौड़ा कर मारा पीटा भी गया।

नया नारा दिया गया

“काम के घंटे चार करो, बेकारी को दूर करो”

अलाली किसे नहीं अच्छी लगती है. ढेरों मिडल क्लास भी कॉम्युनिस्ट समर्थक हो गया। “मज़दूरों को आराम मिलना चाहिए, ये उद्योग खून चूसते हैं।”

“सुभाषिनी अली ” यह मोहतरमा पहले लक्ष्मी सहगल और प्रेम सहगल की पुत्री सुभाषिनी सहगल थी। जवानी के दिनों में इश्क होना स्वभाविक है मगर जब विचारधारा कम्युनिस्ट हो तो इश्क किसके साथ हो रहा है यह सोचने की शक्ति खत्म हो जाती है । मोहतरमा ने मुजफ्फर अली से प्यार किया और सुभाषिनी अली बन गई उनके प्यार का हश्र सभी को मालूम था जवानी ढली और मोहतरमा का तलाक हो गया । कामचोरी और हरामखोरी सर चढ़कर बोला , कानपुर को सुभाषिनी अली के रूप में कम्युनिस्ट सांसद मिला।

________________________

अंततः वह दिन आ ही गया जब कानपुर के मिल मज़दूरों को मेहनत करने से छुट्टी मिल गई। मिलों पर ताला डाल दिया गया।

मिल मालिक आज पहले से शानदार गाड़ियों में घूमते हैं । उन्होंने अहमदाबाद में कारख़ाने खोल दिए। कानपुर की मिल बंद होकर ज़मीन जंगल हो गए। मिल मालिकों को घंटा फर्क नहीं पड़ा ..( क्योंकि मिल मालिकों कभी कम्युनिस्ट के झांसे में नही आए !)

कानपुर के वो 8 घंटे यूनिफॉर्म में काम करने वाला मज़दूर 12 घंटे रिक्शा चलाने और दिहाड़ी मजदूरी करने पर विवश हुआ .. कम्युनिस्टों के शासनकाल में बंगाल पूरी तरह बर्बाद हो गया। बंगाल की तमाम कारखानों में यूनियन बाजी हरामखोर कामचोरी स्ट्राइक आम बात हो गई। मिल मालिकों के साथ गाली-गलौज मारपीट आए दिन होने लगे।बंगाल में कम्युनिस्टों के द्वारा नारा दिया गया “दिते होबे, दिते होबे, चोलबे ना, चोलबे ना” नतीजा यह हुआ सभी कंपनियों में ताले लटक गए। अधिकांश कंपनियां अपने व्यवसाय को बंगाल से हटाकर गुजरात एवं महाराष्ट्र में शिफ्ट कर लिए।

कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों के स्कूल जाने वाले बच्चे कबाड़ बीनने लगे…

और वो मध्यम वर्ग जिसकी आँखों में मज़दूर को काम करता देख खून उतरता था, अधिसंख्य को जीवन में दुबारा कोई नौकरी ना मिली। एक बड़ी जनसंख्या ने अपना जीवन “बेरोज़गार” रहते हुए “डिप्रेशन” में काटा।

____________________________

“कॉम्युनिस्ट अफ़ीम” बहुत “घातक” होती है, उन्हें ही सबसे पहले मारती है, जो इसके चक्कर में पड़ते हैं..!

कॉम्युनिज़म का बेसिक प्रिन्सिपल यह है :

“दो क्लास के बीच पहले अंतर दिखाना, फ़िर इस अंतर की वजह से झगड़ा करवाना और फ़िर दोनों ही क्लास को ख़त्म कर देना”

___________________________

इन दिनों मज़दूर पलायन विषय पर ढेरों कुतर्क सुन रहा हूँ। मजदूरों के पलायन पर आज यही बाम पंथी लोग सबसे ज्यादा दुखी है जिनके कारण मजदूरों का अपने वतन से गुजरात महाराष्ट्र की ओर पलायन हुआ। सबसे ज्यादा मजदूर बिहार उत्तर प्रदेश एवं बंगाल के ही है। बिहार के मजदूरों का पलायन करने का एक बड़ा कारण लंबे समय तक जंगलराज होना एवं वामपंथी नक्सली हिंसा ग्रसित प्रदेश होना भी रहा है।

लोक डाउन में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की जिम्मेवारी थी कि मजदूरों को उचित सहायता प्रदान करें।कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने वाकई सराहनीय कार्य किए और कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री जैसे केजरीवाल ने अपने तमाम पार्टी पदाधिकारियों के साथ मिलकर मजदूरों को सड़क पर ढकेलने का काम किया । अपना सर्वत्र लुटा कर गांव पहुंचे यह मजदूर अपने घरवालों और गांव वालों को कोरोना का प्रसाद बांट रहे हैं ।

भारतवासी 70% रॉयल्टी देकर शराब तो पी सकते हैं मगर ₹5 प्याज का दाम बढ़ जाए तो सरकार को कोसते हैं यही काम मजदूरों ने किया । संकट की इस घड़ी में वह अपने और अपने परिवार को पोसने की बजाय मोदी को कोसने लगे। मजदूर वर्ग कल भी झांसे में थे और आज भी झांसे में है । इन्हीं वामपंथियों द्वारा तमाम तरह की अफवाहें फैलाकर उन्हें घर जाने के लिए बीवी बच्चों के साथ इस कड़ी धूप में सड़कों पर ढकेल दिया है। गांव में इनकी इतनी बड़ी जमींदारी थी तो यह लोग मजदूरी करने क्यों दिल्ली महाराष्ट्र और गुजरात गए थे। उन्हें इतनी भी अक्ल नहीं आई कि इस संकट की घड़ी में बंगलादेशी और रोहिंग्या अपनी और दर्जनों बच्चों को कैसे पाल पोस रहे हैं।

यकीन मानिए करोना भी खत्म होगा और लोक डाउन भी हटे गा उस समय यह मजदूर जो अपना सबकुछ लुटा कर अपने गांव पहुंचे हैं उनके हाथ में कुछ भी नहीं रहेगा। यह जहां नौकरी कर रहे थे वहां उनकी जगह बांग्लादेशी रोहिंग्या नौकरी करते हुए मिलेंगे।

https://bit.ly/2ZUG48a

राम मंदिर उत्खनन और बौद्ध अवशेष का सत्य

जन्मभूमि उत्खनन में जो भी मूर्तिया या अवशेष मिले हैं वे हिन्दु मन्दिर के प्रतीक हैं और इनमें कोई भी बौद्ध स्तूप के अवशेष नही हैं।

इस बात की संभावना हो सकती है कि इसमें बौद्ध मंदिर के अवशेष भी मिल जाएं क्योंकि जिन इस्लामिक आक्रमणकारियों ने मंदिरों को तोड़ा उन्होंने बौद्ध विरासतों को भी समान रूप से तोड़ा नालंदा विश्वविद्यालय इसका सबसे बड़ा सबूत है जिसमें इस्लामिक आक्रमणकारियों ने बौद्ध साहित्य की विश्व की सबसे बड़ी लाइब्रेरी जो तहस नहस कर दिया था।

बाबा साहेब अंबेडकर ने खुद अपनी पुस्तक में इस बात का जिक्र किया कि बौद्ध धर्म को इस्लामिक आक्रमणकारियों ने नष्ट किया।

असल में अयोद्धया में मिले अवशेषों के पीछे राजनीति है। जो समूह इस मामले में विवाद पैदा कर रहा है वे एक राजनैतिक विचारधारा के लोग हैं। ये देश में दलितों और मुस्लिम्स के गठजोड़ को अन्य हिंदुओं के खिलाफ एक राजनैतिक शक्ति बनाना चाह रहे हैं। इन लोगों ने कभी इस्लामिक आक्रमणकारियों द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट करने को पॉलिटिकल मुद्दा नही बनाया इनका विरोध गैर दलित हिंदुओं तक है।

क्योंकि यह साबित हो गया कि ये अवशेष हिन्दू मन्दिर के हैं इसलिए अब यह मुद्दा सोशल मीडिया में खत्म हो गया।

स्त्रोत: https://bit.ly/2zFefWV

PMCARES and Gandhi Family’s donation

दान दक्षिणा देना तो सब अमीरों के चोंचले हैं. बेचारा गरीब गाँधी परिवार किधर से दान देगा.

आज से ४-५ साल पहले पप्पू ने बैंक जाकर, लाइन में लग कर २ हजार रूपये निकाले थे, अब तक उन्ही रुपयों से माँ बेटा अपना काम चला रहे हैं. यदि मेरी बात गलत हो तो आप बता दो, पप्पू कब दोबारा बैंक गया है पैसे निकलवाने.

बेचारा पप्पू इतना गरीब है कि उसके कपडे भी फटे हुए हैं, तो दान किधर से देगा बेचारा.

कई बार तो घर पर कुछ खाने को भी नहीं होता, ऐसी स्तिथि में बेचारा पप्पू किसी दूसरे गरीब के घर जाकर खाना खाता है और अपनी माँ के लिए भी मांग कर ले जाता है.

बेचारी प्रियंका का पति भी गरीब किसान है और बेचारा लॉक डाउन के कारण फसल की कटाई करके बाजार में बेच नहीं पा रहा है.

आप लोग चिंता मत करो. जैसे ही कुछ पैसे की व्यवस्था होगी, गाँधी परिवार अवश्य कुछ ना कुछ दान दक्षिणा अवश्य देगा (अरे भाई पीएम् केयर में नहीं बल्कि निकटतम चर्च या मस्जिद में).

Source https://bit.ly/2TJjKuz

What would you like to convey to Indians?

India has very wide history. People have lived on this land since harappa civilization, may be even before that.

Some months ago the Ayodhya verdict was given by SC of India. It was based on the archeological survey conducted by ASI. The verdict was delayed in during 2000s due to affidavit filed by then Gov’t stating “ Ram is a mythological figure “.

After that in 2019 the verdict was ruled in favor of the Hindus. Due to evidence given by ASI stating that “ the Babri Masjid was build on underlying non Islamic structure “ and they said it is a temple indeed.

So what is my point?

The history of India is being twisted to fit a small group’s agenda. Glorifying the incidents that shouldn’t be a part of history at all.

Even in the Ram temple this same thing has delayed the justice.

Two days ago while clearing the grounds of the alloted lands for temple, people found idols, sculptures and many other historical figures underground. Investigation is going on.

These images have been surfacing on twitter, I cannot be sure that this is real deal, but many media houses have reacted on this matter.

History thaught to us glorify muglas as one of the great rulers of India.

But we always ignore even bigger names.

-Mauryan Empire

-The Mourya empire

-Gupta empire

-The Wodeyar Kingdom or Kingdom of Mysore

-Hoysala empire

-Maratha empire

-The Rajputs dynasty

-Reign of Immadi Pulakeshi, The Chalukya empire

-Chola empire

-Vijyanagar empire

-Satavahana dynasty

-The Sikh empire and list goes on…..

Stay home and upvote 😁.

PS: “ I am not an expert on history or anything. I was just curious about this find on the site so i looked up and found some information, which is what i am sharing here”

Also if anyone have read about old kingdoms that i didnt mention please comment down, i will edit the answer accordignly.

Sources:

1. ‘No historical proof that Ram was real’

2. For historians, Ram remains a myth | India News – Times of India

3. Ram temple trust confirms idols recovery

4. राम जन्मभूमि: जिलानी ने खुदाई में मिले मंदिर के अवशेषों पर उठाए सवाल, संतो ने दिया करारा जवाब

Source: https://bit.ly/2ztcc8s

Is Hinduism a soft target for Bollywood?

Except Govinda in his 90’s movies no big actors even used to enact the scenes of praying to God.

In some movies Govinda even treated his close one’s who were not even biologically related to him as God which is the true depiction of Indian values.

Like Rajesh Khanna in Swarg or Aruna Irani in Raja Babu;


But since 2000’s the remaining sentiment also faded away and it moved more towards mockery.

There have been many movies like Kaho Na Pyaar Hai, 102 Not Out etc. where the protagonists inspite of being Hindus went on to pray in Church and Dargah tried to find eventual solutions.

Though many religious beliefs have been questioned over the years. The small difference is, where all the religions are questioned, Hinduism is ridiculed, and the ridicule is highlighted in a long sequence of the movies like ‘PK’ when one of the most gentle and greatest Hindu god, Shiva (a person acting as Shiva in a nautanki, not actual Shiva) is shown crawling under the seats or hiding in a toilet.


But fortunately we have the South Indian Film industry who are still respecting values of Hinduism and keeping them alive.

Let us take example of Tamil Movie 7 Am Arivu where they promoted Indian virtues and values and have also highlighted the importance of being united.

Here they also told how the foreigners have been manipulating us with their reforms. Karate being inspired from Kalaripayattu and Yoga being inspired from our Yog.

But better marketing and our lesser awareness about history, propaganda movies and distorted content has lead to various manipulations.

Actors like Nagarjuna and Rajinikanth are superstars and in their career they have amazingly excelled playing famous divine characters.

How many Bollywood superstars even belonging to Hindu religion have played saint or divine characters in their prime?

People like Prabhas who played lead role in Baahubali are real heroes and told the world real meaning of Shiva.


With the rising popularity of dubbed movies I hope that the day would come where Bollywood also realizes the progressive nature of our Hindu values and traditions.

Source: https://bit.ly/2zs1M93

Is INDIA dangerous for Foreigners?

YES VERY DANGEROUS INDEED! Here are some of the most dangerous things that happened to me while in India.

Dangerous to your prejudice!

I have never been anywhere in the world quite like India in this regard. People are just simply accepted. There is a difference between acceptance and tolerance. Most places I have been in the world, people are tolerant of tourist, religions, differences and color of your skin. India is accepting. It is truly the most endearing thing about this country in my eyes.

The Indian people have assimilated for centuries of occupations that has helped to create this acceptance. From the Muslim invaders to the British most recently, this country has not lost her identity over thousands of years, yet assimilates parts of the occupiers seamlessly. This is admirable and says a lot about the Indian people.

When you go to India, you let go of your prejudices. You learn from the Indian people how to get along with others and accept, which is the enemy of prejudice.

Dangerous to your tastebuds!

The food is a balance between spicy and sweet that simply makes me happy. There is little better feeling than the curries that tickle my lips with almost a buzz after eating Indian Food. From the biryani to the curries, from pani puri (sp) to the Chole Bhature and Kati Rolls of Delhi. By no means am I a vegetarian, however this is the only country where I could eat veg and not care one bit.

The Indian food is dangerous to numbing your tastebuds to really really good food with more flavor complexities than you are accustomed to.

Dangerous to your World View!

I can not honestly say that before going to India, my worldview was complete. It still isn’t complete by any means, but I thought I had a pretty good grip on it. After going to India… It exploded and made me realize how ignorant I really was to the views of others in the world.

The Indian people see life differently than the rest of the world. Not in a negative way, just very different. Maybe it is from being an ancient civilization and developing a philosophy that is tried and true. Coming from America, we have a civilization and culture of only a couple hundred years old. This is an infant to the Indians who have been entrenched in their culture since human existence practically.

So Is It Dangerous?

Go to India! See for yourself! It is dangerous for many reasons. But is it dangerous to your personal safety, (which is what the original poster was probably getting at)?

NOT IN OUR EXPERIENCE!

We never felt as if our lives were in danger, or that we were in a dangerous situation. Does it have its dangers… of course. Just like anywhere else in the world. Whoever is reading this can say the same about their own land.

There are dangers everywhere and it is up to you to be smart and travel well by avoiding the dangers or being put into dangerous positions where others can take advantage of you.

Source: https://bit.ly/2B6OpLS

Is Brahma Kumaris good or a fraud?

Source https://bit.ly/2X45Zsk

6 years back, I joined Brahma Kumaris…… I got touched with their philosophy of peace(shanti) and especially the way Sister Shivani explained the problems of dealing with stress, relationship problems etc on ‘Awakening with Brahma Kumaris’.

Although being an IITian(mind sees for logic) I never questioned their logic just because I was getting peace from their meditation.

Later I starting searching for logic and stopped following because of illogical things they say

What they say :-

  1. There are four yugas -Satyuga, Treta Yuga, Dwapar Yuga and Kali Yuga each of 1250 years. After every 5000 years destruction takes place in the world and again creation of world takes place and same cycle follows.
    1. Counter Logic
      1. There are many archaeological facts which is based on carbon dating which gives the age of many things, like bones, metals, etc which sometimes are way old to 50000 years ago means even after 10 times destruction that thing still exists.
      2. If you believe in Hindu scriptures which tells the life of Kali yuga, then it defies that since life of just Kali yuga is 4,32,000 years.
      3. Existence of dinosaurs which became extinct around 65 million years ago, what about that.
  2. Soul doesn’t exist in animals, it only exist in human beings.
    1. Then how when a dog’s puppy is killed it cries.
    2. Any living being has consciousness and what has consciousness should be having a soul.
  3. All Ramayana, Mahabharata, etc are mythology they never happened in real
    1. Then what about existence of Dwaraka which is scientifically proven, it existed and was drowned
    2. What about Ram Setu and there are still certain number of stones floating in Rameshvaram and Dhanushkoti
  4. They say world is going to end soon
    1. In 1976 they claimed world is going to end, then in 2000 and then again in 2012 now they claim it is going to end in 2036. They keep shifting their dates when it doesn’t end.
    2. Their is no such big environmental change that it is going to end by 2036, according to scientists it will still take around 56000 years to end. If we refer to Vedas it will end after 4,27,000 years
  5. There is only this earth and life doesn’t exist on other planets
    1. Recently USA Defense Dept. has officially uploaded a video recorded by US Navy through their radar of a UFO. If it doesn’t exist how UFO exists.

Why people tend to believe them even sometimes educated people?

  1. Their meditation gives peace
    1. That is not something new, any meditation gives peace.
    2. Try Vishen Lekhiani 6 phase meditation, that gives super peace, and motivate us towards our goal that doesn’t make it spiritual he himself says that.
    3. In their meditation they provoke your love for god by referring god as father(baba), so due to emotion generated by person doing meditation can get tears in his eyes, that’s not spiritual that’s simply emotional feeling
    4. Their are many meditation processes eg, Art of Living’s, Hare Krishna Meditation, Sadhguru’s and all of them give peace and joy, if we start believing all of them, then there will be contradictions
  2. They allow sessions for free
    1. That is their trap and their way to attract, it is long term investment, one time free then whole life they will be accepting money
  3. They really care for us and talk very softly and lovingly
    1. Again trap to attract us
  4. Their knowledge really makes mind peaceful
    1. They have not invented that, its there in Bhagavad Gita.
    2. Many of their talks are directly taken from Bhagavad Gita and normal moral understanding. For example- if bad is happening with us we cannot blame anyone, it is us who have to be blamed since its our karma which is causing us suffering. If we start thinking more in this karma philosophy we will ourselves start getting things what they tell us
    3. If people are belonging to Hindu faith then that is their ignorance in their scriptures and lack of following of those scriptures which take them to get captured in their hands. Other religions I don’t have information.
    4. Their philosophy of soul is again taken from Bhagavat Gita, and many of its applications are already applied in Srimad Bhagavatam which are way too much mature then theirs. So please read once these two scriptures you can yourself decide then.
  5. If someone is not believing in their ideology he will not get place in satyuga
    1. That’s their trap to believe in them. If we question them or not believe in them, then we are not the chosen one to be 9,00,000 of those who are going to be in Sat Yuga.
    2. They are having limitation of seats for getting admission into Sat Yuga, which defies logic since god is unlimited and so should be his abode.
  6. God directly comes in their body so their knowledge is original
    1. WTF, in India out of every 3 above 80 year old person 1 will claim that god enters their body
    2. Sometimes they show god entering their some old women body and she whisper in low voice and people believe god has entered her body, even I can do that low class acting
  7. If you follow this process and becomes superior to everyone you will become Laxmi-Narayana in Sat-Yuga
    1. Its like preparing for JEE test, where if we outperform everyone else we will get 1st rank.
    2. How it is spiritual, since it makes people competitive, every one would want to become laxmi-narayana and there can be only one.
    3. Every person dreams of becoming big, wealthy, famous but their greed goes to another level of becoming directly god. Its not spiritual its material since their core intentions are material only
    4. Once I went to a temple in Hyderabad, their I believe they were true adherents, since when I asked them what they would get of worshiping Lord they told we would get service of Lord, then I asked them but god would have limited servants, they told they would be very happy to serve those who are serving god. Their I felt it is spiritual, it is not limited that only 9,00,000 people can enter Sat-Yuga.

I don’t believe that all people serving there are fraud, many are innocent(including my parents that’s why have to write anonymously), and are misguided. Main reason for their misguidance is due to this environment we are living in(alone, work stress, relationship problem) and they are taking benefit by introducing some meditation and so illogical philosophy. 90% people there are innocent according to me and may be more, but top people I am not sure, or may be they are also misguided.

Thanks for patience to read this answer.

सोचने योग्य बात #2

घटना उस समय की है छोटे भाई बी डी एस कर के आया था।बोला भईया मेरा एक निजी अस्पताल बनवा दिजिए और जो छोटा-मोटा काम करते हैं बन्द कर दिजिए। अस्पताल में अन्दर मैं देख लूंगा और बाहर का आप देख लीजिएगा। फिर देखिए मैं कैसे घर की तकदीर बदल देता हूं। कुछ साल में निजी अस्पताल बन गया।सब ठीक-ठाक चल रहा था ज्यादा दिन नही मात्र छः महीने तक। एक दिन बोला भईया आप दूसरा काम देख लिजिए। मैं चुपचाप अस्पताल छोड़ दिया।एक महिने बाद बोला भईया मुझे अलग रहना है। मैं बोला ठीक है पापा से पुछ लो। खैर कुछ दिन बाद अलग हो गया। अस्पताल बनते समय ही घर का बहुत ही समान पहले ही लेगया था अस्पताल में परिवार रहने की व्यवस्था है।बाद में जो घर में समान या वस्तु था सब में आधा किया।घर में आठ पंखा था चार पहले ही ले गया अस्पताल में,घर पे चार टी बी था दो पहले ही लेगया था टी बी अस्पताल में। ऐसे ही बहुत कुछ। मेरे समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

मैं सोचता हूं गलती कहां हो गई। लगता है उसे लालच ने दिमाग ख़राब कर दिया या उसे लगा कि अब अस्पताल बन गया,चल ही रहा है भईया की क्या जरूरत है।

बिना मेहनत किए उम्र से पहले जब कोई वस्तु या चीज मिल जाती है तो दिल और दिमाग वश में नही रहता है। यह एक खतरे का संकेत है आने वाले समय में।

सोचने योग्य बात

कल मैंने 550 रु किलो की दर से घी लिया

पिताजी बोले कि हमारे समय में तो इतने रुपए में ‘ढ़ेर सारा’ घी आ जाता

मैंने बोला, पिताजी ढ़ेर सारा यानी क्या? उदाहरण देकर समझाइये।

मेरी बात सुन पिताजी शांत रह गए।

मैंने फिर पूछा, पिताजी ढ़ेर सारा क्या?

पिताजी कुछ नहीं बोले, बस चुपचाप छत पर आ गए।

ऊपर आकर वो शांति से बैठे, पानी पिया फिर बोले बेटा, ‘ढ़ेर सारा’ यानि बहुत, उदाहरण देकर कहूँ तो हमारे समय में इतने रुपए में इतना घी आ जाता कि पूरा मोहल्ला एक एक कटोरी घी पी लेता।

मैं बोला पिताजी, ये उदाहरण तो आप नीचे भी दे सकते थे।

बेटा, नीचे बहुत भीड़ थी और “भीड़ को उदाहरण समझ नही आता है।”

मैं बोला, पिताजी में समझा नही…

‘भीड़ को उदाहरण’ मतलब क्यों नही ?

पिताजी बोले… एक बार मोदी जी ने कहा था कि “विदेशों में हमारे देश का बहुत पैसा जमा है।”

भीड़ ने कहा कि कितना?

तो मोदी जी ने उदाहरण देकर समझाया, “इतना कि पूरा पैसा अगर वापस आ जाए तो सभी के हिस्से में 15-15 लाख आ जाए।

बस सुनने वालों की भीड़ तभी से “15 लाख” मांग रही है।

और ये उदाहरण अगर मैं नीचे देता तो हो सकता है कि कल कई लोग अपनी अपनी कटोरी लेकर घी मांगने आ जाते।

क्या आप किसी से नफरत करते हैं?

जी हां, मैं उनसे नफरत करता हूं

  • जो जिहादी हैं,
  • जो मुझे काफिर के तरह समझते हैं,
  • जो भारत में शरिया लागू करना चाहते हैं,
  • जो गजवा ए हिंद स्थापित करना चाहते हैं,
  • जो हमारे सैनिकों पर पत्थर फेंकते हैं,
  • जो भारत को टुकड़ों में बांटना चाहते हैं।

और मुझे तनिक भी चिंता नहीं कि कौन मुझसे खुश होंगे और कौन नाराज। मुझे तनिक भी शर्मिंदगी भी नहीं है यह कहने में कि मैं उनसे नफरत करता हूं और हमेशा करता रहूंगा।

मूल लेखक अंकित पाठक

स्त्रोत https://bit.ly/2ZABQCK

Introduction (परिचय)

This is an blog of collected qoutes written by all original Author’s at various website’s.

We don’t own the contents. All rights reserved with original author’s and writers.

We support the Views posted here. हम यहां लिखी गई सभी बातों का समर्थन करते हैं। आपको कोई तकलीफ होने पर हम उत्तरदायी नहीं हैं।

Why we do this?

  • Because it gives new readers context. What are you about? Why should they read your blog?
  • Because it will help you focus your own ideas about our blog and what you’d like to do with it.

The posts here can be short or long, a personal intro to our life or a bloggy mission statement, a manifesto for the future or a simple outline of the types of things we would like to publish.

यहां पोस्ट छोटी या लंबी हो सकती हैं, हमारे जीवन का एक व्यक्तिगत परिचय या ब्लॉग मिशन स्टेटमेंट, भविष्य के लिए एक घोषणापत्र या उन चीजों के प्रकारों की एक सरल रूपरेखा जिसे हम प्रकाशित करना चाहते हैं।